भगवान शिव के प्रथम ज्योतिर्लिंग विश्वप्रसिद्ध सोमनाथ जी के दर्शन की अभिलाषा मन में तब से थी जबसे जबलपुर-राजकोट एक्सप्रेस को सोमनाथ तक बढ़ाया गया था । सोमनाथ जाने का तय हुआ तो एक मित्र ने कहा कि वहीँ से द्वारका भी हो आना । चार धामों में से एक द्वारका या द्वारिका गुजरात में स्थित भारत का अत्यंत मत्वपूर्ण तीर्थ है । फिर द्वारका और सोमनाथ की योजना बन ही रही थी गुजरात के अक्षरधाम मंदिर के दर्शन का विचार भी आया और इस प्रकार अहमदाबाद भी हमारे कार्यक्रम का हिस्सा बन गया ।
सौभाग्य से श्री विवेक शर्मा जी और उनका परिवार भी इस यात्रा में हमारे साथ रहा । शर्मा परिवार के साथ हमारी यह दूसरी धार्मिक यात्रा है । इसके पहले सन् 2011 में हम लोग सब श्री वैष्णो देवी जी की यात्रा पर गये थे । विवेक शर्मा जी मेरे अभिन्न मित्र हैं और हम दोनों के परिवारों के आपस में बहुत घनिष्ट सम्बन्ध हैं इसलिए उनके साथ कोई भी आउटिंग या यात्रा बहुत ही सुखद होती है । कारवाँ शुरू हुआ जबलपुर से, जहाँ से शर्माजी का परिवार चढ़ा जबलपुर-सोमनाथ एक्सप्रेस में और लगभग तीन बजे दोपहर में हम लोग जुड़ गए ।
भोपाल निकलने के बाद हम सबने खाना खाया और उज्जैन से पहले सभी लोग सो गए । हमारा पहला पड़ाव था अहमदाबाद ।
अहमदाबाद का रेलवे रिटायरिंग रूम स्टेशन के ऊपर प्रथम मंजिल पर था । हमारे दोनों कमरे काफी बड़े और साफ़ सुथरे थे ।
अहमदाबाद में मेरे एक बहुत ही खास मित्र भी सपरिवार निवास करते हैं श्री अशोक पटेल जी । अशोक जी स्वास्थ्य विभाग में टेक्नीशियन पद पर हैं और विगत लगभग एक वर्ष से अहमदाबाद में हैं । वे मेरे बचपन के करीबी मित्र हैं और स्कूल में भी मेरे साथ पढ़े हैं । हमारे अहमदाबाद आगमन की जानकारी उनको कई महीनों पहले से थी । अशोक जी हमारे आने की सूचना से काफी उत्साहित थे ।
पहले मेरी योजना थी दिन भर अहमदाबाद घूमकर शाम को गांधीनगर स्थित अक्षरधाम मंदिर जाने की परन्तु अहमदाबाद की गर्मी ने हमें अपनी योजना बदलने को विवश कर दिया । अब सिर्फ अक्षरधाम मंदिर और कांकरिया झील ही हमारे कार्यक्रम का हिस्सा थे ।
इतनी गर्मी की मुझे बिलकुल उम्मीद नहीं थी इसलिए सितम्बर का महीना चुना था क्योंकि सितम्बर के मध्य तक सामान्यतः बरसात का मौसम भी समाप्त हो जाता है, गर्मी भी नहीं होती है और ठंडी का आगमन भी नहीं होता है ।
लगभग डेढ़ बजे हम खाना खाकर निकल गए अक्षरधाम मंदिर । अशोक भाई ने एक ओला कैब और एक उबेर कैब बुक कर दी थीं । लगभग एक घण्टे में हम गांधीनगर स्थित अक्षरधाम मंदिर पहुँच गये । मंदिर में कैमरा, मोबाइल, बैग आदि ले जाना मना है इन सबको जमा करने हेतु निशुल्क काउंटर बने हुए हैं । मंदिर के बाहर गुजराती परिधानों की दुकानें हैं और सामने रोड के दूसरी तरफ खाने पीने की बहुत सी छोटी बड़ी दुकानें हैं ।
हमने अपने मोबाइल, कैमरा वगैरह काउंटर पर जमा करके मंदिर में प्रवेश किया । प्रवेश द्वार पर सुरक्षा जांच कर्मचारी एक प्लास्टिक की ट्रे देते हैं जिसमे अपने पर्स, बेल्ट, घडी आदि रखना होता है, फिर थोड़ा आगे दुसरे सुरक्षा जांच कर्मचारी उन वस्तुओं की जाँच करते हैं फिर मंदिर परिसर में प्रवेश मिलता है ।
गांधीनगर का अक्षरधाम मंदिर वही है जो सन् 2002 में आतंकी हमले के बाद लाइमलाइट में आया था । इसका निर्माण स्वमीनारायण संप्रदाय द्वारा सन् 1992 में कराया गया था । भगवान् स्वामींनारायण को सपर्पित यह मंदिर 32 मीटर ऊंचा, 73 मीटर लंबा और 39 मीटर चौड़ा है। इसका निर्माण 6000 गुलाबी बलुआ पत्थरों से हुआ है ।
मंदिर परिसर में कैमरा तो निषेध है पर अगर आप यादगार के लिए अपनी फोटो खिंचवाना चाहें तो फोटोग्राफर उपलब्ध हैं जो 100 रु प्रति फोटो की दर से फोटो खींचकर देते हैं । परिसर में गार्डन और फव्वारे बहुत ही आकर्षक हैं । बच्चों के खेलकूद एवं मनोरंजन के लिए झूले आदि हैं । मुख्य भवन में भगवान् स्वमीनारायन की स्वर्णजड़ित मूर्ती के अलावा उनके शिष्यों की भी मूर्तियां हैं जिन्होंने पंथ को सम्हाला । ऊपर प्रथम तल पर स्वामीनारायण जी के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएं चित्र रूप में हैं । उसके बाद एक संग्रहालय है जिसमे बहुत सी ऐंसी वस्तुएं हैं जिनका उपयोग स्वामीनारायन जी ने स्वयं किया था । पांच प्रदर्शनी हाल बने हुए हैं जिनमे दो-ढाई घंटे की स्वामीनारायण जी से जुडी प्रदर्शनी है, शायद चलचित्र के रूप में । मेरी माताजी की कोई इच्छा नहीं थी इसलिये हम वहां नहीं गए । अभी लगभग 4 बजा था और मंदिर परिसर में शाम को दिखाये जाने वाले बहुचर्चित लेज़र लाइट शो जिसे वाटर शो भी कहते हैं में 3 घंटे का समय बाकी था । इतनी देर तक इंतज़ार करने के पक्ष में कोई भी नहीं था इसलिए हम मंदिर से बाहर आ गए । कैमरा नहीं होने के कारण चित्र नहीं ले सके ।
"कला प्रदर्शनियों, उत्कृष्ट शिल्प कला एवं अध्यात्म का अनूठा संगम है अक्षरधाम मंदिर"
बाहर स्थित दुकानों पर हम लोगों ने स्वल्पाहार किया । उसके बाद एक वैन बुक करके वापस अहमदाबाद का रुख किया । पता नहीं गर्मी का असर था या बाहर के खाना का दुष्प्रभाव जिससे मुझे सरदर्द होना शुरू हो गया । उस दिन अहमदाबाद में गणेश विसर्जन था जिससे कई बार हमारी गाडी ट्रैफिक जाम में भी फंसी । कांकरिया लेक पर बच्चों के मनोरंजन के साधनों का खजाना है । कई प्रकार के झूले, टॉय ट्रेन, बलून राइड और पता नहीं क्या क्या । लेकिन वहां पहुँचते पहुँचते मेरा सरदर्द असहनीय हो गया । वैसे भी सब लोग थके हुए तो थे ही, थोड़ी देर तक कांकरिया झील पर रुके फिर ऑटो से अपने ठिकाने पर चले गए । पूरे दिन अशोक भाई हमारे साथ रहे । शाम को उन्होंने मेरे लिए दवा की व्यवस्था की । मेरी तबियत से पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही उन्होंने हमारा साथ छोड़ा । उनके आतिथि सत्कार का मैं सदैव कृतज्ञ रहूँगा ।
रात में कब नींद लगी पता ही नहीं चला । सुबह उठे, स्नान इत्यादि करके नाश्ता करते करते 8 बज गए । चेकआउट का समय भी आठ बजे ही था । चेकआउट करके हम प्लेटफार्म नम्बर 1 पर पहुँच गए जहाँ से 8.55 पर हमारी द्वारिका जाने वाली ट्रेन थी जो समय पर आ गई । अहमदाबाद से द्वारिका दिन भर की यात्रा थी । अगर आप ऐंसे रेलमार्ग पर यात्रा कर रहे हैं जो आपके लिए नया हो और आप अगर सो नहीं रहे हैं तो ट्रैंन के स्टॉपेज वाले हर स्टेशन को देखते हैं या देखने का प्रयास करते हैं कि कौनसा स्टेशन है, यह मानवीय स्वभाव है । हम भी यही करते हुए आगे बढ़ते रहे । ट्रैन में मेरा दही या छाछ पीने का बहुत मन कर रहा था तभी अचानक एक छाछ बेंचने वाला प्रकट हो गया । मेरी तो जैसे मन मांगी मुराद पूरी हो गई । सफर में हमारे एक हमसफ़र थे बड़ौदा निवासी एक 75 वर्षीय दादाजी । उन्होंने बताया कि वे कई साल से लगातार नियमित रूप से हर पूर्णिमा के दिन भगवान द्वारकाधीश के दर्शन करने जाया करते हैं । हंसमुख, जिंदादिल और इस उम्र में भी अकेले सफर करने में पूर्णतः सक्षम । वे अपना ज्ञान और अनुभव हमसे साँझा करते रहे ।
जैसी की उम्मीद थी, हमारी ट्रेन निर्धारित समय पर ठीक सात बजे द्वारिका स्टेशन पहुँच गई ।
सौभाग्य से श्री विवेक शर्मा जी और उनका परिवार भी इस यात्रा में हमारे साथ रहा । शर्मा परिवार के साथ हमारी यह दूसरी धार्मिक यात्रा है । इसके पहले सन् 2011 में हम लोग सब श्री वैष्णो देवी जी की यात्रा पर गये थे । विवेक शर्मा जी मेरे अभिन्न मित्र हैं और हम दोनों के परिवारों के आपस में बहुत घनिष्ट सम्बन्ध हैं इसलिए उनके साथ कोई भी आउटिंग या यात्रा बहुत ही सुखद होती है । कारवाँ शुरू हुआ जबलपुर से, जहाँ से शर्माजी का परिवार चढ़ा जबलपुर-सोमनाथ एक्सप्रेस में और लगभग तीन बजे दोपहर में हम लोग जुड़ गए ।
भोपाल निकलने के बाद हम सबने खाना खाया और उज्जैन से पहले सभी लोग सो गए । हमारा पहला पड़ाव था अहमदाबाद ।
अहमदाबाद
सुबह ट्रैन ठीक आठ बजे अहमदाबाद पहुँच गई । इस बार मैंने होटल की बजाय रेलवे के विश्रामालय (रिटायरिंग रूम) बुक किये थे । रिटायरिंग रूम में सुबह 8 बजे या शाम को 20 बजे चेक इन किया जा सकता है । रिटायरिंग रूम 12, 24,36 या अधिकतम 48 घण्टों के लिए आपकी यात्रा के प्रारम्भिक स्टेशन या गंतव्य स्टेशन के लिए ऑनलाइन बुक किया जा सकता है ।अहमदाबाद का रेलवे रिटायरिंग रूम स्टेशन के ऊपर प्रथम मंजिल पर था । हमारे दोनों कमरे काफी बड़े और साफ़ सुथरे थे ।
अहमदाबाद में मेरे एक बहुत ही खास मित्र भी सपरिवार निवास करते हैं श्री अशोक पटेल जी । अशोक जी स्वास्थ्य विभाग में टेक्नीशियन पद पर हैं और विगत लगभग एक वर्ष से अहमदाबाद में हैं । वे मेरे बचपन के करीबी मित्र हैं और स्कूल में भी मेरे साथ पढ़े हैं । हमारे अहमदाबाद आगमन की जानकारी उनको कई महीनों पहले से थी । अशोक जी हमारे आने की सूचना से काफी उत्साहित थे ।
पहले मेरी योजना थी दिन भर अहमदाबाद घूमकर शाम को गांधीनगर स्थित अक्षरधाम मंदिर जाने की परन्तु अहमदाबाद की गर्मी ने हमें अपनी योजना बदलने को विवश कर दिया । अब सिर्फ अक्षरधाम मंदिर और कांकरिया झील ही हमारे कार्यक्रम का हिस्सा थे ।
इतनी गर्मी की मुझे बिलकुल उम्मीद नहीं थी इसलिए सितम्बर का महीना चुना था क्योंकि सितम्बर के मध्य तक सामान्यतः बरसात का मौसम भी समाप्त हो जाता है, गर्मी भी नहीं होती है और ठंडी का आगमन भी नहीं होता है ।
अक्षरधाम
"जहाँ कला चिरयुवा है, संस्कृति असीमित है और मूल्य कालातीत हैं।"
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| अक्षरधाम मंदिर. चित्र- गूगल से साभार |
लगभग डेढ़ बजे हम खाना खाकर निकल गए अक्षरधाम मंदिर । अशोक भाई ने एक ओला कैब और एक उबेर कैब बुक कर दी थीं । लगभग एक घण्टे में हम गांधीनगर स्थित अक्षरधाम मंदिर पहुँच गये । मंदिर में कैमरा, मोबाइल, बैग आदि ले जाना मना है इन सबको जमा करने हेतु निशुल्क काउंटर बने हुए हैं । मंदिर के बाहर गुजराती परिधानों की दुकानें हैं और सामने रोड के दूसरी तरफ खाने पीने की बहुत सी छोटी बड़ी दुकानें हैं ।
हमने अपने मोबाइल, कैमरा वगैरह काउंटर पर जमा करके मंदिर में प्रवेश किया । प्रवेश द्वार पर सुरक्षा जांच कर्मचारी एक प्लास्टिक की ट्रे देते हैं जिसमे अपने पर्स, बेल्ट, घडी आदि रखना होता है, फिर थोड़ा आगे दुसरे सुरक्षा जांच कर्मचारी उन वस्तुओं की जाँच करते हैं फिर मंदिर परिसर में प्रवेश मिलता है ।
गांधीनगर का अक्षरधाम मंदिर वही है जो सन् 2002 में आतंकी हमले के बाद लाइमलाइट में आया था । इसका निर्माण स्वमीनारायण संप्रदाय द्वारा सन् 1992 में कराया गया था । भगवान् स्वामींनारायण को सपर्पित यह मंदिर 32 मीटर ऊंचा, 73 मीटर लंबा और 39 मीटर चौड़ा है। इसका निर्माण 6000 गुलाबी बलुआ पत्थरों से हुआ है ।
मंदिर परिसर में कैमरा तो निषेध है पर अगर आप यादगार के लिए अपनी फोटो खिंचवाना चाहें तो फोटोग्राफर उपलब्ध हैं जो 100 रु प्रति फोटो की दर से फोटो खींचकर देते हैं । परिसर में गार्डन और फव्वारे बहुत ही आकर्षक हैं । बच्चों के खेलकूद एवं मनोरंजन के लिए झूले आदि हैं । मुख्य भवन में भगवान् स्वमीनारायन की स्वर्णजड़ित मूर्ती के अलावा उनके शिष्यों की भी मूर्तियां हैं जिन्होंने पंथ को सम्हाला । ऊपर प्रथम तल पर स्वामीनारायण जी के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएं चित्र रूप में हैं । उसके बाद एक संग्रहालय है जिसमे बहुत सी ऐंसी वस्तुएं हैं जिनका उपयोग स्वामीनारायन जी ने स्वयं किया था । पांच प्रदर्शनी हाल बने हुए हैं जिनमे दो-ढाई घंटे की स्वामीनारायण जी से जुडी प्रदर्शनी है, शायद चलचित्र के रूप में । मेरी माताजी की कोई इच्छा नहीं थी इसलिये हम वहां नहीं गए । अभी लगभग 4 बजा था और मंदिर परिसर में शाम को दिखाये जाने वाले बहुचर्चित लेज़र लाइट शो जिसे वाटर शो भी कहते हैं में 3 घंटे का समय बाकी था । इतनी देर तक इंतज़ार करने के पक्ष में कोई भी नहीं था इसलिए हम मंदिर से बाहर आ गए । कैमरा नहीं होने के कारण चित्र नहीं ले सके ।
"कला प्रदर्शनियों, उत्कृष्ट शिल्प कला एवं अध्यात्म का अनूठा संगम है अक्षरधाम मंदिर"
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| अक्षरधाम मंदिर के सामने |
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| सान्वी और अर्नव |
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| अशोक पटैल जी, अक्षरधाम मंदिर के सामने |
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| जबलपुर सोमनाथ एक्सप्रेस में |
बाहर स्थित दुकानों पर हम लोगों ने स्वल्पाहार किया । उसके बाद एक वैन बुक करके वापस अहमदाबाद का रुख किया । पता नहीं गर्मी का असर था या बाहर के खाना का दुष्प्रभाव जिससे मुझे सरदर्द होना शुरू हो गया । उस दिन अहमदाबाद में गणेश विसर्जन था जिससे कई बार हमारी गाडी ट्रैफिक जाम में भी फंसी । कांकरिया लेक पर बच्चों के मनोरंजन के साधनों का खजाना है । कई प्रकार के झूले, टॉय ट्रेन, बलून राइड और पता नहीं क्या क्या । लेकिन वहां पहुँचते पहुँचते मेरा सरदर्द असहनीय हो गया । वैसे भी सब लोग थके हुए तो थे ही, थोड़ी देर तक कांकरिया झील पर रुके फिर ऑटो से अपने ठिकाने पर चले गए । पूरे दिन अशोक भाई हमारे साथ रहे । शाम को उन्होंने मेरे लिए दवा की व्यवस्था की । मेरी तबियत से पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही उन्होंने हमारा साथ छोड़ा । उनके आतिथि सत्कार का मैं सदैव कृतज्ञ रहूँगा ।
रात में कब नींद लगी पता ही नहीं चला । सुबह उठे, स्नान इत्यादि करके नाश्ता करते करते 8 बज गए । चेकआउट का समय भी आठ बजे ही था । चेकआउट करके हम प्लेटफार्म नम्बर 1 पर पहुँच गए जहाँ से 8.55 पर हमारी द्वारिका जाने वाली ट्रेन थी जो समय पर आ गई । अहमदाबाद से द्वारिका दिन भर की यात्रा थी । अगर आप ऐंसे रेलमार्ग पर यात्रा कर रहे हैं जो आपके लिए नया हो और आप अगर सो नहीं रहे हैं तो ट्रैंन के स्टॉपेज वाले हर स्टेशन को देखते हैं या देखने का प्रयास करते हैं कि कौनसा स्टेशन है, यह मानवीय स्वभाव है । हम भी यही करते हुए आगे बढ़ते रहे । ट्रैन में मेरा दही या छाछ पीने का बहुत मन कर रहा था तभी अचानक एक छाछ बेंचने वाला प्रकट हो गया । मेरी तो जैसे मन मांगी मुराद पूरी हो गई । सफर में हमारे एक हमसफ़र थे बड़ौदा निवासी एक 75 वर्षीय दादाजी । उन्होंने बताया कि वे कई साल से लगातार नियमित रूप से हर पूर्णिमा के दिन भगवान द्वारकाधीश के दर्शन करने जाया करते हैं । हंसमुख, जिंदादिल और इस उम्र में भी अकेले सफर करने में पूर्णतः सक्षम । वे अपना ज्ञान और अनुभव हमसे साँझा करते रहे ।
जैसी की उम्मीद थी, हमारी ट्रेन निर्धारित समय पर ठीक सात बजे द्वारिका स्टेशन पहुँच गई ।





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