पिछले भाग से आगे...
द्वारिका नगरी वही है जिसे भगवान् श्रीकृष्ण ने लगभग 5000 वर्ष पूर्व मथुरा छोड़ने के बाद बसाया था । द्वारिका में शासन करते हुए ही भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में पांडवों को सहयोग किया और धर्म की विजय करवाई । हमारी ट्रेन सात बजे द्वारका स्टेशन पहुच गई । द्वारका में भी मैंने रिटायरिंग रूम बुक किया हुआ था । रिटायरिंग रूम में चेक-इन 8 बजे होता है । सबको वेटिंग रूम में बैठाकर मैं और शर्माजी पता करने गए कि अगर हमारे कमरे अभी खाली हैं तो क्या हमें समय से पूर्व मिल सकते हैं । कमरे तो खाली थे पर परिचारक ने हमे 8 बजे से पहले कमरे देने से मना कर दिया । मैंने महज कुछ मिनट पहले रूम लेने के लिए उसको अपनी पहचान बताना उचित नहीं समझा और हम वेटिंग रूम आ गए । कुछ देर बाद पता नही क्या सोचकर उसने स्वयं एक व्यक्ति को भेजा हमे बुलाने के लिए जिसने कहा कि आप अपने रूम में आ सकते हैं । साढ़े सात के पहले हमें अपने रूम मिल गए , इससे लाभ यह हुआ कि हम आज ही द्वारकाधीश मंदिर के दर्शन कर पाने की स्थिति में आ गए । स्नान इत्यादि करके हम सब 8:30 बजे तक तैयार होकर निकल पड़े द्वारकाधीश मंदिर ।
जहाँ भगवान् श्री कृष्ण का निजी निवास था आज उसी स्थान पर द्वारकाधीश मंदिर है । आदि शंकराचार्य ने इस स्थान को भारत के चार धामों में से एक माना है ।
माना जाता है कि मूल मंदिर का निर्माण श्रीकृष्ण के प्रपौत्र ने करवाया था जिसका कालान्तर में जीर्णोद्धार किया जाता रहा । वर्तमान स्वरूप मंदिर को 16वीं शताब्दी में प्राप्त हुआ ।
द्वारकाधीश मंदिर में भी मोबाइल और कैमरा ले जाने की अनुमति नहीं है, यह बात मुझे प्रवेश द्वार पर पता चली । फिर मैंने सबके मोबाइल और कैमरा लेकर मंदिर परिसर में मोबाइल कैमरा आदि रखने हेतु मंदिर प्रशासन द्वारा संचालित निशुल्क काउंटर पर पहुँचा । काउंटर पर कोई सीसीटीवी कैमरा नहीं लगा हुआ था । उन्होंने मोबाइल फोन और कैमरा लेकर एक पर्ची लिखकर मुझे दी जिसमे 1 और 4 लिखा हुआ था । मतलब एक कैमरा और चार मोबाइल ।
मंदिर के मुख्य द्वार के सामने काफी व्यस्त व्यावसायिक क्षेत्र है जहाँ प्रसाद, पूजन सामग्री, फूलमाला की दुकानें एवं होटल, धर्मशाला और भोजनालय आदि हैं ।
हमने मंदिर में प्रवेश किया तब आरती चल रही थी और लोग थमे हुए थे । भीड़भाड़ बहुत कम थी इसलिए हमें भी आरती में सम्मिलित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । गर्भगृह में भगवान द्वारकाधीश की चतुर्भुजी श्यामवर्णी प्रतिमा है । मेरे आगे एक बुजुर्ग व्यक्ति खड़े थे उन्होंने बताया कि आज सुबह आये थे तो बहुत ज्यादा भीड़ होने के कारण बिना दर्शन किये ही लौट गये थे इसलिए अब आये हैं । मतलब हमारा सुबह का इंतज़ार किये बिना आज ही भगवान द्वारकाधीश के दर्शन के लिये आना बिलकुल सही निर्णय था । श्रीकृष्ण को यहाँ रणछोड़ जी भी कहते हैं । रणछोर जी के मंदिर के अलावा इस परिसर में और भी बहुत से मंदिर हैं एवं शारदा मठ है । आदि गुरू शंकराचार्य ने देश के चार कोनों में चार मठ बनाए थे जिनमें एक शारदा मठ है ।
मनभावन रणछोड़ जी के मन भरकर दर्शन किये उसके बाद बाहर आकर मैंने मंदिर की कुछ फोटो लीं । उसके बाद हमने उस भोजनालय में खाना खाया जो ऑटो वाले ने रेकमेंड किया था । बढ़िया भोजनालय था, नाम याद नहीं आ रहा, मंदिर के मुख्य द्वार से गोमती घाट जाने वाले रास्ते पर ढलान वाली रोड पर है ।
खाना खाकर हम लोग स्टेशन पर अपने रिटायरिंग रूम आ गए । द्वारका रेलवे स्टेशन पर वेटिंग हाल और रिटायरिंग रूम(विश्रामालय) के नाम बहुत ही अनोखे अंदाज में लिखे हुए हैं जैसे रुक्मणी प्रतीक्षालय (महिला), नागेश्वर प्रतीक्षालय(पुरुष) और द्वारकेश विश्रामालय । हैं ना अनोखे ?
द्वारकेश विश्रामालय पहुंचकर शर्मा फैमिली अपने शयनकक्ष में चली गई और कुछ देर प्लेटफार्म पर टहलने के बाद हम भी सो गए ।
सुबह उठकर दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होने के पश्चात् मैं और शर्माजी निकल पड़े भद्रकाली चौक जहाँ हमे बेट द्वारका और नागेश्वर के लिए कैब/टैक्सी बुक करनी थी । वैसे तो भद्रकाली चौक से द्वारका म्युनिसिपेलिटी की बस भी चलती है जो 5 घण्टे में नागेश्वर, गोपी तालाब, बेट द्वारका और रुक्मणी देवी मंदिर के दर्शन करवाती है । यह बस दो पालियों में सुबह 8 बजे और दोपहर 2 बजे से चलती है । बस में एक गाइड भी होता है और बस का किराया भी उचित है 100 रु प्रति व्यक्ति । परन्तु मैंने सुना था कि बस का हर स्थान पर एक निश्चित समयसीमा तक ही रुकने का नियम है और उतनी समयसीमा में ही आपको दर्शन, पूजन आदि सम्पन्न करके वापस बस में आना होता है । इसलिए हमने निजी टैक्सी बुक करने को प्राथमिकता दी । बच्चों और माताजी का साथ था इसलिए रिस्क नहीं लिया जा सकता था ।
सबसे पहले मैंने और शर्माजी ने भद्रकाली चौक पर ढोकले और पोहा का नाश्ता किया फिर एक टूर्स एंड ट्रेवल्स पर हमने एक वातानुकूलित टवेरा गाडी बुक की । तय हुआ की ठीक दो बजे ड्राइवर हमारे पास पहुँच जायेगा । यहाँ दो शिफ्टो में ही साइट सीइंग करवाई जाती है मंदिरों की टाइमिंग के कारण । टैक्सी बुक करके हम 9 बजे तक वापस आ गए । अभी हमारे पास पर्याप्त समय था इसलिए हमने एक ऑटोरिक्शा लिया और सीधा पहुंचे गोमती घाट ।
गोमती घाट द्वारकाधीश मंदिर के दक्षिणी द्वार पर है जहाँ गोमती नदी सागर में मिलती है । वहीँ पर सुदामा सेतु नाम से एक पुल बना जिसमे प्रवेश के लिए टिकट लेना पड़ता है । देखने से लग रहा था कि अभी नया निर्मित हुआ है । सुदामा सेतु सम्भवतः सागर दर्शन हेतु बनाया गया है । गोमती घाट पर समुद्र की लहरों में सभी को खासकर बच्चों को बहुत आनन्द आया । समुद्र की लहरों से हम में से अशिकांश का यह पहला आमना सामना था । अर्नव का हाथ पकड़कर मैंने उसको स्नान करवाया । उसका बाहर आने का कोई इरादा नहीं था परन्तु एक ऊँची लहर आयी जिससे उसके मुंह में समुद्र का खारा पानी आ गया तभी वह बाहर आया ।
बहुत से श्रद्धालु गोमती घाट में स्नान कर द्वारकाधीश मंदिर में प्रवेश करते हैं । घाट से 56 सीढियां चढ़कर सीधे द्वारकाधीश मंदिर में प्रवेश किया जा सकता है । एक दुकान में हमने प्रसाद लिया और वहीँ कैमरा, मोबाइल, पर्स और जूते चप्पल रखे । प्रसाद की दुकान वाला थोड़ा मजाकिया था, वो अपने आप को बार बार पुलिस का आदमी कह रहा था । मंदिर में प्रवेश के समय अर्नव मेरे साथ ही था । एक माला वाले से 10 रूपये में दो मालाएं ली, एक तुलसी के पत्तों की और एक फूलों की । अर्नव ने अपनी जेब से सात रूपये चिल्लर निकाल कर माला वाले को दे दिए । मुझे और माला वाले दोनों को हंसी आ गई । फिर मैंने वो चिल्लर माला वाले से वापस लेकर उसको दस का नोट दिया । तब तक बाकी साथी काफी आगे बढ़ चुके थे । मैं और शर्माजी एक साथ मंदिर में दाखिल हुए । लेडीज पहले ही अंदर जा चुकी थीं और हमारी प्रतीक्षा कर रही थीं, उनके साथ एक पंडित जी थाल लिए खड़े और उनको कुछ समझा रहे थे । यह देखकर मैं और शर्माजी भलीभांति समझ चुके थे कि माजरा क्या है । फिर हमने उनको वहां से बुलाया और आगे बढ़ गए । पंडितजी ने हमे रोकने का पूरा प्रयास किया पर हम नहीं रुके । मैं अनावश्यक रूप से पण्डे पुजारियों के चक्कर में नहीं पड़ता । वहीँ पड़ता हूँ जहां नितांत आवश्यक हो ।
मंदिर में इतनी ज्यादा भीड़ थी कि शब्दों में बयाँ करना मुश्किल है । दो घण्टे से पहले दर्शन मिलने वाले नहीं थे । हम कल शाम को बहुत अच्छे से दर्शन कर ही चुके थे इसलिए आज दूर से ही करबद्ध प्रार्थना कर ली । मंदिर में हमे वो 75 वर्षीय वृद्ध पुरुष फिर मिल गए जो ट्रैन में हमारे साथ थे । बहुत ही आश्चर्य और प्रसन्नता हुई । वे भी हमसे मिलकर गदगद हो गए । आज उनके साथ कुछ और लोग भी थे । वो अपने साथियों को गुजराती भाषा में हम लोगों के विषय में बताने लगे । इतनी ज्यादा भीड़ में उनका मिलना किसी आश्चर्य से कम नहीं था । थोड़ी देर मंदिर के प्रांगड़ में बैठे, असीम मानसिक शांति मिली ।
फिर बाहर निकलकर अपना मोबाइल, कैमरा आदि लिया । मेरे मोबाइल में दो मिस्ड कॉल थे । गुजरात का नम्बर था, मैंने कॉल किया तो उसने कहा मैं ड्राइवर हूँ, साइट सीइंग के लिए चलना है ना, मैं डेढ़ बजे पहुँच जाऊंगा, आप लोग तैयार रहियेगा । फिर हमने कुछ खरीददारी की, फिर उसी होटल में स्वल्पाहार किया जहाँ कल डिनर किया था । वैसे तो द्वारकाधीश मंदिर के आसपास 2-3 किलोमीटर के दायरे में बहुत से मंदिर हैं परंतु समयाभाव के कारण हम नही गये और वापस अपने विश्रामालय आ गए ।
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द्वारिका नगरी वही है जिसे भगवान् श्रीकृष्ण ने लगभग 5000 वर्ष पूर्व मथुरा छोड़ने के बाद बसाया था । द्वारिका में शासन करते हुए ही भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में पांडवों को सहयोग किया और धर्म की विजय करवाई । हमारी ट्रेन सात बजे द्वारका स्टेशन पहुच गई । द्वारका में भी मैंने रिटायरिंग रूम बुक किया हुआ था । रिटायरिंग रूम में चेक-इन 8 बजे होता है । सबको वेटिंग रूम में बैठाकर मैं और शर्माजी पता करने गए कि अगर हमारे कमरे अभी खाली हैं तो क्या हमें समय से पूर्व मिल सकते हैं । कमरे तो खाली थे पर परिचारक ने हमे 8 बजे से पहले कमरे देने से मना कर दिया । मैंने महज कुछ मिनट पहले रूम लेने के लिए उसको अपनी पहचान बताना उचित नहीं समझा और हम वेटिंग रूम आ गए । कुछ देर बाद पता नही क्या सोचकर उसने स्वयं एक व्यक्ति को भेजा हमे बुलाने के लिए जिसने कहा कि आप अपने रूम में आ सकते हैं । साढ़े सात के पहले हमें अपने रूम मिल गए , इससे लाभ यह हुआ कि हम आज ही द्वारकाधीश मंदिर के दर्शन कर पाने की स्थिति में आ गए । स्नान इत्यादि करके हम सब 8:30 बजे तक तैयार होकर निकल पड़े द्वारकाधीश मंदिर ।
द्वारकाधीश मंदिर
जहाँ भगवान् श्री कृष्ण का निजी निवास था आज उसी स्थान पर द्वारकाधीश मंदिर है । आदि शंकराचार्य ने इस स्थान को भारत के चार धामों में से एक माना है ।
माना जाता है कि मूल मंदिर का निर्माण श्रीकृष्ण के प्रपौत्र ने करवाया था जिसका कालान्तर में जीर्णोद्धार किया जाता रहा । वर्तमान स्वरूप मंदिर को 16वीं शताब्दी में प्राप्त हुआ ।
द्वारकाधीश मंदिर में भी मोबाइल और कैमरा ले जाने की अनुमति नहीं है, यह बात मुझे प्रवेश द्वार पर पता चली । फिर मैंने सबके मोबाइल और कैमरा लेकर मंदिर परिसर में मोबाइल कैमरा आदि रखने हेतु मंदिर प्रशासन द्वारा संचालित निशुल्क काउंटर पर पहुँचा । काउंटर पर कोई सीसीटीवी कैमरा नहीं लगा हुआ था । उन्होंने मोबाइल फोन और कैमरा लेकर एक पर्ची लिखकर मुझे दी जिसमे 1 और 4 लिखा हुआ था । मतलब एक कैमरा और चार मोबाइल ।
मंदिर के मुख्य द्वार के सामने काफी व्यस्त व्यावसायिक क्षेत्र है जहाँ प्रसाद, पूजन सामग्री, फूलमाला की दुकानें एवं होटल, धर्मशाला और भोजनालय आदि हैं ।
हमने मंदिर में प्रवेश किया तब आरती चल रही थी और लोग थमे हुए थे । भीड़भाड़ बहुत कम थी इसलिए हमें भी आरती में सम्मिलित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । गर्भगृह में भगवान द्वारकाधीश की चतुर्भुजी श्यामवर्णी प्रतिमा है । मेरे आगे एक बुजुर्ग व्यक्ति खड़े थे उन्होंने बताया कि आज सुबह आये थे तो बहुत ज्यादा भीड़ होने के कारण बिना दर्शन किये ही लौट गये थे इसलिए अब आये हैं । मतलब हमारा सुबह का इंतज़ार किये बिना आज ही भगवान द्वारकाधीश के दर्शन के लिये आना बिलकुल सही निर्णय था । श्रीकृष्ण को यहाँ रणछोड़ जी भी कहते हैं । रणछोर जी के मंदिर के अलावा इस परिसर में और भी बहुत से मंदिर हैं एवं शारदा मठ है । आदि गुरू शंकराचार्य ने देश के चार कोनों में चार मठ बनाए थे जिनमें एक शारदा मठ है ।
मनभावन रणछोड़ जी के मन भरकर दर्शन किये उसके बाद बाहर आकर मैंने मंदिर की कुछ फोटो लीं । उसके बाद हमने उस भोजनालय में खाना खाया जो ऑटो वाले ने रेकमेंड किया था । बढ़िया भोजनालय था, नाम याद नहीं आ रहा, मंदिर के मुख्य द्वार से गोमती घाट जाने वाले रास्ते पर ढलान वाली रोड पर है ।
खाना खाकर हम लोग स्टेशन पर अपने रिटायरिंग रूम आ गए । द्वारका रेलवे स्टेशन पर वेटिंग हाल और रिटायरिंग रूम(विश्रामालय) के नाम बहुत ही अनोखे अंदाज में लिखे हुए हैं जैसे रुक्मणी प्रतीक्षालय (महिला), नागेश्वर प्रतीक्षालय(पुरुष) और द्वारकेश विश्रामालय । हैं ना अनोखे ?
द्वारकेश विश्रामालय पहुंचकर शर्मा फैमिली अपने शयनकक्ष में चली गई और कुछ देर प्लेटफार्म पर टहलने के बाद हम भी सो गए ।
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सुबह उठकर दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होने के पश्चात् मैं और शर्माजी निकल पड़े भद्रकाली चौक जहाँ हमे बेट द्वारका और नागेश्वर के लिए कैब/टैक्सी बुक करनी थी । वैसे तो भद्रकाली चौक से द्वारका म्युनिसिपेलिटी की बस भी चलती है जो 5 घण्टे में नागेश्वर, गोपी तालाब, बेट द्वारका और रुक्मणी देवी मंदिर के दर्शन करवाती है । यह बस दो पालियों में सुबह 8 बजे और दोपहर 2 बजे से चलती है । बस में एक गाइड भी होता है और बस का किराया भी उचित है 100 रु प्रति व्यक्ति । परन्तु मैंने सुना था कि बस का हर स्थान पर एक निश्चित समयसीमा तक ही रुकने का नियम है और उतनी समयसीमा में ही आपको दर्शन, पूजन आदि सम्पन्न करके वापस बस में आना होता है । इसलिए हमने निजी टैक्सी बुक करने को प्राथमिकता दी । बच्चों और माताजी का साथ था इसलिए रिस्क नहीं लिया जा सकता था ।
सबसे पहले मैंने और शर्माजी ने भद्रकाली चौक पर ढोकले और पोहा का नाश्ता किया फिर एक टूर्स एंड ट्रेवल्स पर हमने एक वातानुकूलित टवेरा गाडी बुक की । तय हुआ की ठीक दो बजे ड्राइवर हमारे पास पहुँच जायेगा । यहाँ दो शिफ्टो में ही साइट सीइंग करवाई जाती है मंदिरों की टाइमिंग के कारण । टैक्सी बुक करके हम 9 बजे तक वापस आ गए । अभी हमारे पास पर्याप्त समय था इसलिए हमने एक ऑटोरिक्शा लिया और सीधा पहुंचे गोमती घाट ।
गोमती घाट द्वारकाधीश मंदिर के दक्षिणी द्वार पर है जहाँ गोमती नदी सागर में मिलती है । वहीँ पर सुदामा सेतु नाम से एक पुल बना जिसमे प्रवेश के लिए टिकट लेना पड़ता है । देखने से लग रहा था कि अभी नया निर्मित हुआ है । सुदामा सेतु सम्भवतः सागर दर्शन हेतु बनाया गया है । गोमती घाट पर समुद्र की लहरों में सभी को खासकर बच्चों को बहुत आनन्द आया । समुद्र की लहरों से हम में से अशिकांश का यह पहला आमना सामना था । अर्नव का हाथ पकड़कर मैंने उसको स्नान करवाया । उसका बाहर आने का कोई इरादा नहीं था परन्तु एक ऊँची लहर आयी जिससे उसके मुंह में समुद्र का खारा पानी आ गया तभी वह बाहर आया ।
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| गोमती घाट |
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| सुदामा सेतु |
बहुत से श्रद्धालु गोमती घाट में स्नान कर द्वारकाधीश मंदिर में प्रवेश करते हैं । घाट से 56 सीढियां चढ़कर सीधे द्वारकाधीश मंदिर में प्रवेश किया जा सकता है । एक दुकान में हमने प्रसाद लिया और वहीँ कैमरा, मोबाइल, पर्स और जूते चप्पल रखे । प्रसाद की दुकान वाला थोड़ा मजाकिया था, वो अपने आप को बार बार पुलिस का आदमी कह रहा था । मंदिर में प्रवेश के समय अर्नव मेरे साथ ही था । एक माला वाले से 10 रूपये में दो मालाएं ली, एक तुलसी के पत्तों की और एक फूलों की । अर्नव ने अपनी जेब से सात रूपये चिल्लर निकाल कर माला वाले को दे दिए । मुझे और माला वाले दोनों को हंसी आ गई । फिर मैंने वो चिल्लर माला वाले से वापस लेकर उसको दस का नोट दिया । तब तक बाकी साथी काफी आगे बढ़ चुके थे । मैं और शर्माजी एक साथ मंदिर में दाखिल हुए । लेडीज पहले ही अंदर जा चुकी थीं और हमारी प्रतीक्षा कर रही थीं, उनके साथ एक पंडित जी थाल लिए खड़े और उनको कुछ समझा रहे थे । यह देखकर मैं और शर्माजी भलीभांति समझ चुके थे कि माजरा क्या है । फिर हमने उनको वहां से बुलाया और आगे बढ़ गए । पंडितजी ने हमे रोकने का पूरा प्रयास किया पर हम नहीं रुके । मैं अनावश्यक रूप से पण्डे पुजारियों के चक्कर में नहीं पड़ता । वहीँ पड़ता हूँ जहां नितांत आवश्यक हो ।
मंदिर में इतनी ज्यादा भीड़ थी कि शब्दों में बयाँ करना मुश्किल है । दो घण्टे से पहले दर्शन मिलने वाले नहीं थे । हम कल शाम को बहुत अच्छे से दर्शन कर ही चुके थे इसलिए आज दूर से ही करबद्ध प्रार्थना कर ली । मंदिर में हमे वो 75 वर्षीय वृद्ध पुरुष फिर मिल गए जो ट्रैन में हमारे साथ थे । बहुत ही आश्चर्य और प्रसन्नता हुई । वे भी हमसे मिलकर गदगद हो गए । आज उनके साथ कुछ और लोग भी थे । वो अपने साथियों को गुजराती भाषा में हम लोगों के विषय में बताने लगे । इतनी ज्यादा भीड़ में उनका मिलना किसी आश्चर्य से कम नहीं था । थोड़ी देर मंदिर के प्रांगड़ में बैठे, असीम मानसिक शांति मिली ।
फिर बाहर निकलकर अपना मोबाइल, कैमरा आदि लिया । मेरे मोबाइल में दो मिस्ड कॉल थे । गुजरात का नम्बर था, मैंने कॉल किया तो उसने कहा मैं ड्राइवर हूँ, साइट सीइंग के लिए चलना है ना, मैं डेढ़ बजे पहुँच जाऊंगा, आप लोग तैयार रहियेगा । फिर हमने कुछ खरीददारी की, फिर उसी होटल में स्वल्पाहार किया जहाँ कल डिनर किया था । वैसे तो द्वारकाधीश मंदिर के आसपास 2-3 किलोमीटर के दायरे में बहुत से मंदिर हैं परंतु समयाभाव के कारण हम नही गये और वापस अपने विश्रामालय आ गए ।
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| द्वारकाधीश मंदिर, गोमती घाट वाले मार्ग से |










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