Wednesday, December 14, 2016

सोमनाथ

सोमनाथ मंदिर..

धार्मिक आस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र और सनातन धर्म के वैभवशाली इतिहास का प्रतीक !




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ट्रैन सोमनाथ स्टेशन पर निर्धारित समय पर पहुँच गई और पहुँचते ही सबकी नींद भी खुल गई । सोमनाथ स्टेशन रेल टर्मिनल है जहाँ पर रेलमार्ग समाप्त हो जाता है । यहाँ भी रिटायरिंग रूम बुक थे, जो 8 बजे मिलने वाले थे । निवेदन करने पर हमें रूम सात बजे मिल गए । तब तक प्रतीक्षालय और प्लेटफार्म पर कुछ समय बिताया । आज मौसम बहुत खुशनुमा था ।




सोमनाथ स्टेशन पर मैं अपने नए कैमरे का परीक्षण करते हुए और शर्माजी अपनी फिटनेस का 😁😁







सोमनाथ रेलवे स्टेशन बाहर से




अहमदाबाद और द्वारका के रिटायरिंग रूम बहुत बेहतरीन थे परंतु सोमनाथ का रिटायरिंग रूम उस स्तर का नहीं था और एसी भी आवाज कर रहा था । स्नान इत्यादि करके सब तैयार हो गए । मैं और कन्हैया जी आज दिन भर के कार्यक्रम की योजना बनाने हेतु अन्वेषण या छानबीन करने के उद्देश्य से स्टेशन के बाहर निकले परन्तु स्टेशन के आसपास कुछ चहल-पहल नहीं थी और एक चाय बिस्कुट इत्यादि की छोटी सी दुकान के अलावा दूर दूर तक कोई दूकान नहीं थी । इसलिए हम पहुँच गए मंदिर के आसपास के क्षेत्र । हमें मंदिर से कुछ दूरी पर लीलावती नामक एक गेस्ट हाउस दिखा जो मंदिर ट्रस्ट द्वारा संचालित है । काफी बड़ा और सर्वसुविधायुक्त है । पता चला कि मंदिर ट्रस्ट द्वारा दो और अतिथि-गृह संचालित हैं माहेश्वरी और सागर दर्शन नाम से । पहले पता होता तो यहीं रूम बुक करते ।
खैर, दर्शनीय स्थलों में यहाँ का मुख्य आकर्षण सोमनाथ मंदिर ही है । कुछ मंदिर और हैं जो ज्यादा दूर नहीं हैं । टैक्सी हमे मिली नहीं इसलिए एक ऑटो बुक करके हम उसे स्टेशन ले गए । फिर सब उसमे सवार होकर निकल पड़े नगर भ्रमण हेतु । हमारा पहला पड़ाव था वह, जहाँ जाने की इच्छा मन में कई वर्षों से थी "श्री सोमनाथ मंदिर" ।


सोमनाथ मंदिर

भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिम में अरब सागर के तट पर स्थित है हिन्दू धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ सोमनाथ । इस धरा पर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से यह प्रथम और सबसे प्रमुख माना जाता है । कहते हैं इसकी स्थापना स्वयं चंद्रदेव( चन्द्रमा) ने की थी ।
पौराणिक कथाओं के अनुसार चन्द्रदेव ने दक्ष की 27 कन्यायों से विवाह किया था किंतु वे उनमे से एक रोहिणी नामक पत्नि को ही प्रेम और सम्मान देते थे । उनकी अन्य पत्नियों ने इसकी शिकायत अपने पिता दक्ष से की तो उन्होंने क्रोधित होकर चंद्र देव को श्राप दिया कि तुम्हारा तेज(कांति) दिन प्रतिदिन क्षीण होता रहेगा । इस श्राप से मुक्ति के लिए चन्द्र देव ने भगवान् शिव की आराधना की और तभी इस शिवलिंग की स्थापना की । यहाँ भगवान शिव प्रकट प्रकट हुए और उन्होंने चन्द्रदेव का उद्धार किया । इसका वर्णन ऋग्वेद में भी मिलता है । माना जाता है कि सृष्टि की रचना के समय भी यह ज्योतिर्लिंग विद्यमान था ।

सोमनाथ मंदिर की ख्याति सदियों से सम्पूर्ण विश्व में रही है । इस मंदिर पर 17 बार विधर्मियों ने आक्रमण किये । बार बार मंदिर को ध्वस्त किया और संपत्ति को लूटा गया । मंदिर का बार बार पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार किया जाता रहा । सन 1026 में महमूद गज़नी ने जिस शिवलिंग को खण्डित किया वही आदि शिवलिंग था ।

वर्तमान में जो मंदिर विद्यमान है इसके निर्माण का श्रेय जाता है सरदार बल्लभ भाई पटैल को । 8 मई, 1950 को मंदिर की आधार शिला सौराष्ट्र के पूर्व राजा दिग्विजय सिंह ने  रखी तथा 11 मई, 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर में ज्योतिर्लिंग स्थापित किया ।

हम जब पहुंचे तब आसमान में बादल छाए हुए थे और बारिश दस्तक दे रही थी । मंदिर के बाहर बहुत सारे कबूतर मंडरा रहे थे । कबूतरों को दाना खिलाने का विचार मेरे मन में आया परन्तु साथी सब आगे बढ़ चुके थे इसलिए मैंने सोचा कि पहले दर्शन कर लिए जाएँ । मंदिर के मुख्य द्वार से काफी पहले ही एक प्रवेश द्वार है जहाँ सुरक्षा जांच कर्मी तैनात हैं । उसके थोड़ा आगे एक सुन्दर दिग्विजय द्वार बना हुआ है जो जामनगर की राजमाता ने अपने स्वर्गीय पति की स्मृति में 1970 में बनवाया था । सोमनाथ मंदिर कला के दृष्टिकोण से बहुत ही आकर्षक है । महासागर भी मंदिर की सुंदरता और भव्यता में चार चाँद लगाता है । ऐंसा प्रतीत होता है मानो महासागर की लहरें शिव के चरण पखार रही हों । मंदिर में प्रवेश करते एक अलग ही अनुभूति हुई  ऐंसा लगा जैसे जीवन धन्य हो गया हो । शिवलिंग की छटा भी निराली और मनमोहक है । यहाँ भक्तों को गर्भगृह में तो प्रवेश नहीं मिलता परन्तु दूर से शिवलिंग पर गंगाजल से अभिषेक करने की व्यवस्था है । चढ़ाया गया जल पम्प द्वारा शिवलिंग तक पहुँचता है ।
बाहर निकलकर कुछ देर मंदिर प्रांगड़ से ही सागर दर्शन किया इतने में बूँदाबादी शुरू हो गई । फिर हम मंदिर से बाहर निकल आये । परिसर में कुछ और मंदिर भी हैं । मंदिर प्रांगड़ में शाम को एक घण्टे का 'साउंड एंड लाइट' शो होता है जिसमें सोमनाथ मंदिर के धार्मिक और ऐतिहासिक घटनाक्रम का सचित्र विवरण प्रस्तुत किया जाता है ।


सोमनाथ मुख्य मंदिर से बाहर निकलकर बायीं ओर थोड़ा सा चलकर एक और मंदिर है जिसे पुराना सोमनाथ मंदिर कहते हैं । इसका निर्माण अहिल्या बाई होल्कर ने करवाया था । यहाँ भी एक शिवलिंग स्थापित है । यहाँ सभागृह बड़ा नहीं है । मुख्य द्वार से प्रवेश कर श्रद्धालु पंक्तिबद्ध होकर गर्भगृह तक पहुँचते हैं और शिवलिंग के दर्शन कर सीधा चलते हुए दुसरे द्वार से बाहर निकलते हैं ।
दोनों मंदिरों के बाद मुझे कबूतरों को दाना खिलाने की याद आयी पर अब बारिश शुरू हो चुकी थी इसलिए सभी कबूतर कहीं शरण लिए हुए थे ।
हम अपने ऑटो में बैठे और निकल पड़े सोमनाथ के अन्य दर्शनीय स्थलों की ओर ।



पाँच पांडव गुफा

पाँच पांडव गुफा नामक यह मंदिर बाबा नारायणदास जी ने सन 1949 में बनवाया था । यह मंदिर पांडव भाइयों को समर्पित है यहाँ आदि शंकराचार्य और उनके शिष्यों की भी मूर्तियां भी हैं ।




सूर्य मंदिर

सूर्य मंदिर भी अति प्राचीन मंदिर है । इसका निर्माण भगवान सूर्य की पूजा अर्चना हेतु करवाया गया था ।


गीता मंदिर

गीता मंदिर का निर्माण बिरला परिवार द्वारा 1970 में करवाया गया था । मंदिर के सभागृह की भीतरी दीवारों पर सफ़ेद मार्बल पर गीता के श्लोकों को उकेरा गया है ।
गीता मंदिर परिसर में ही बलरामजी की गुफा, लक्ष्मीनारायण मंदिर, देहोत्सर्ग स्थल, श्री काशी विश्वनाथ मंदिर, महाप्रभुजी की बैठक आदि स्थित हैं ।











त्रिवेणी संगम

त्रिवेणी घाट या त्रिवेणी संगम तीन नदियों का संगम है कपिल, हिरन और रहस्यमयी नदी सरस्वती । कहा जाता है कि भालुका तीर्थ में तीर लगने के बाद भगवान् श्री कृष्ण घायल अवस्था में इस स्थान पर भी आये थे । मान्यता है कि इस घाट पर स्नान करने से दुखों व रोगों से मुक्ति मिलती है । त्रिवेणी संगम का वर्णन पौराणिक ग्रन्थों में भी मिलता है ।




बाणगंगा

बाणगंगा बड़ा ही मनोरम स्थान है । यहाँ समुद्र के किनारे शिवलिंग स्थापित किया गया है जो । समुद्र की लहरें आती हैं और शिवलिंग को जलमग्न कर वापस लौट जाती हैं । मानो प्रकृति द्वारा बार बार अनवरत शिवलिंग का अभिषेक किया जा रहा हो ।






भालका तीर्थ


सोमनाथ मुख्य मंदिर के बाद वेरावल में धार्मिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण स्थान है भालका तीर्थ । इस तीर्थस्थान के बारे में मान्यता है कि यहाँ पर विश्राम करते समय ही भगवान श्री कृष्ण के पैर के अंगूठे में जर नामक शिकारी ने गलती से तीर मारा था, जिसके पश्चात् उन्होनें पृथ्वी पर अपनी लीला समाप्त करते हुए निजधाम प्रस्थान किया।

श्री सोमनाथ ट्रस्ट द्वारा प्रबंधित इस स्थान को एक भव्य तीर्थ एवं पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजना पर कार्य चल रहा है । फिलहाल यहाँ श्रीकृष्ण का एक मंदिर निर्माणाधीन है ।

भालका तीर्थ के पास

निर्माणाधीन मंदिर के सामने




भालका तीर्थ हमारा अंतिम पड़ाव था । लगभग दो ढाई बजे चुके थे । सुबह नाश्ता थोड़ा हैवी हो गया था इसलिए लंच करने का मन नहीं कर रहा था, सो हम लोग सीधे अपने विश्रामालय पहुंचे । मेरा प्लान था कि थोड़ी देर विश्राम करने के पश्चात् समुद्र तट पर जाकर कुछ फोटो लूंगा और वहीँ कुछ भोजन भी किया जायेगा । परन्तु यात्रा के दौरान हर काम प्लान के मुताबिक नहीं होता । थकान तो थी ही, रात्रि में ट्रेन में नींद भी अच्छे से नहीं हो पाई थी इसलिए विश्रामालय पहुँचते ही सब गहरी नींद में सो गए और जब आँख खुली तो देखा कि अँधेरा हो चुका है । समुद्र तट पर मनोरंजन और फोटोग्राफी का मेरा अरमान दिल में ही रह गया ।

अब बस एक ही काम था जो आज सोमनाथ में किया जा सकता था, और वह था सोमनाथ मंदिर में प्रतिदिन शाम को होने वाला साउंड एंड लाइट शो देखना । जल्दी जल्दी तैयार होकर हम निर्धारित समय पर सोमनाथ मंदिर पहुँच गये । परन्तु वहां पहुंचकर पता चला कि साउंड एंड लाइट शो आज नहीं होगा । क्योंकि बारिश के सीजन में और बेमौसम बारिश के दिनों में भी शो का प्रदर्शन नहीं किया जाता । सम्भवतः यह शो, मंदिर के बाहर खुले आसमान के नीचे प्रदर्शित किया जाता है । थोड़ा अफ़सोस हुआ पर सोमनाथ मंदिर के पुनः दर्शन कर मन प्रसन्न हो गया । इसके बाद हमने कुछ खरीददारी की और सोमनाथ ट्रस्ट द्वारा संचालित भोजनालय में भोजन किया । यह एक सेल्फ सर्विस भोजनालय है जो मंदिर के समीप ही है । यहाँ भोजन बहुत ही सस्ता और सुस्वाद है ।


दोपहर में भरपूर नींद हो गई थी इसलिए अब आसानी से नींद नहीं आ रही थी । कुछ देर तक पूरी यात्रा के दौरान लिए गए चित्र देखता रहा फिर सो गया । सुबह उठकर आठ बजे तक सब लोग तैयार हो गए और सामान पैक भी कर लिया । आज हमारी यात्रा का अंतिम दिन था । हमारी ट्रैन सोमनाथ-जबलपुर एक्सप्रेस सुबह 9.30 पर थी । आठ बजते ही हमारे कमरे का दरवाजा किसी ने खटखटाया । दरवाजा खोला तो एक नवयुवक था जिसने सहमते सकुचाते हुए कहा कि ये दोनों रूम हमारे लिए बुक हैं । हम लोग सुबह 6 बजे से वेटिंग हाल में बैठे 8 बजने का इंतज़ार कर रहे हैं, अगर आप अभी एक रूम भी हमें दे दें तो हम अपना सामान वगैरह रखना शुरू करें । परन्तु हमने दोनों कमरे तत्काल छोड़ दिए क्योंकि हम तो आठ बजे निकलने के लिए पूरी तरह तैयार बैठे ही थे । कुछ देर बाद हमारी ट्रेन भी प्लेटफार्म पर लग गई ।

आज सोमनाथ में बहुत बारिश हो रही थी । स्टेशन की कैंटीन से लंच पैक करवाकर ट्रैन में बैठ गए । 9.30 बजे गाड़ी सोमनाथ स्टेशन से रवाना हो गई । अशोक पटैल जी का फोन आया कि शाम को गाड़ी 6 बजे अहमदाबाद पहुंचेगी और वो सपरिवार हमसे मिलने आएंगे अहमदाबाद स्टेशन पर । शाम को सही समय पर गाड़ी अहमदाबाद पहुँच गई । अशोक भाई के साथ साथ भाभी जी और बच्चों से भी मिलना जुलना हो गया जो किसी कारणवश उस दिन अहमदाबाद यात्रा वाले दिन नहीं हो सका था । अशोक भाई हम लोगों के लिए शाम का खाना भी लेकर आये । इतने दिनों से घर से बाहर निकले थे, आज बहुत दिनों बाद घर का बना खाना नसीब हुआ था जो बहुत ही स्वादिष्ट था । पटैल परिवार से हुई संक्षिप्त मुलाकात बहुत यादगार रही ।


बड़ौदा स्टेशन निकलने के कुछ देर बाद हम लोग सो गए । मेरी नींद सुबह जब खुली तब गाड़ी बैरागढ़ स्टेशन पर खड़ी थी, निर्धारित समय से पहले ही आ गई थी । भोपाल स्टेशन पर मैंने चाय पी जो इतनी घटिया थी कि ऐंसी चाय मैं मुफ्त में भी नहीं पिया करता । वक्त और गाड़ी दोनों का पहिया चलता रहा । विवेक(कन्हैया) शर्मा भाई और भाबीजी से वार्तालाप करते हुए समय का पता ही नहीं चला ।
इस ब्लॉग के माध्यम से मैं शर्मा परिवार को भी बहुत बहुत धन्यवाद कहना चाहूंगा जिनके साथ होने से हमारी पूरी यात्रा बहुत ही सुखद और आनंददायक रही ।


हमारी ट्रैन सही समय पर सोहागपुर पहुँच गई जहाँ हम उतर गए और शर्माजी सपरिवार सीधा उसी ट्रैन से आगे निकल गये ।

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