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डेढ़ बजे हमारी टैक्सी आ गई । सब तैयार ही थे । हमारा पहला पड़ाव था नागेश्वर मंदिर ।
मंदिर के भीतर कैमरा, मोबाइल आदि ले जाने की कोई मनाही नहीं है परंतु फोटोग्राफी/वीडियोग्राफी करना मना है । मंदिर में प्रवेश करने के बाद एक सभाग्रह पड़ता है जिसमे पूजा सामग्री, प्रसाद इत्यादि की दुकानें हैं । उसके बाद गर्भगृह जो थोड़ा निचले स्तर पर है जिसमें शिवलिंग है । मतलब दर्शन के लिए थोड़ा नीचे की ओर देखना पड़ता है । दर्शन बड़े इत्मीनान से हो गए । शिवलिंग पर चांदी का आवरण है और ऊपर एक नाग की आकृति है । एक निश्चित शुल्क देकर गर्भगृह में अभिषेक करने की व्यवस्था भी है । इस सुविधा का लाभ शर्माजी ने उठाया ।
बाहर निकलकर मैंने नारियल पानी पिया फिर हम सबने गोपी तालाब की ओर प्रस्थान किया ।
गोपी तालाब की और उसके आसपास मिट्टी पीली है और बहुत ही मुलायम है, इसे गोपी चन्दन कहते हैं । गोपी चन्दन यहाँ स्थित दुकानों पर विक्रय हेतु भी उपलब्ध है । गोपी तालाब के किनारे एक कदम्ब का पेड़ है जिस पर श्रद्धालुओं द्वारा बांधे गये बहुत से मन्नत के धागे बंधे हुए थे । वहीँ किनारे स्थानीय लोगों द्वारा बनवाये हुए कुछ मंदिर हैं । कुछ दुकानें भी लगी हुई थीं । इसके बाद हम निकल पड़े बेट-द्वारका की ओर ।
कहते हैं कि भगवान कृष्ण और उनके बाल सखा सुदामा की भेंट इस स्थान पर ही हुई थी इसलिए इसे भेंट द्वारका या बेट द्वारका कहा जाता है ।
द्वारका शहर से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है बेट द्वारका । बेट द्वारका समुद्र में एक टापू है जहाँ ओखा से जहाज द्वारा जाया जाता है । समुद्र 160 किलोमीटर तक फैला है उसके बाद पाकिस्तान का कराची शहर है ।
ओखा में ड्राइवर ने हमे वहां छोड़ा जहाँ से बेट द्वारका जाने हेतु फेरी/छोटा जहाज मिलता है । लगभग पांच मिनट पैदल चलकर हम जहाज तक पहुंचे । एक जहाज जो पूरा भर चूका था, जा रहा था और दूसरा अभी अभी लगा था जिसमे हम बैठे । जल्दी ही वो भी भर गया । लगभग सौ से डेढ़ सौ लोग भरे गये थे उसमे जो निश्चित ही क्षमता से अधिक थे । सागर में बहुत से जहाज खड़े हुए थे जो मुख्य रूप से मछली पकड़ने हेतु उपयोग में लाये जाते हैं । यहाँ ओखा में मुस्लिमों की आबादी बहुत है और अधिकतर जहाज उन्ही के हैं ।
जहाज से लगभग आधे घंटे लगते है बेट द्वारका पहुँचने में । समुद्र में जहाज पर यात्रा करना बहुत ही आनंददायक और रोमांचक अनुभव है । विशेषकर बच्चों को तो बहुत ही आनन्द आया । मंदिर खुलने का समय शाम को पांच बजे है और साढ़े चार बजे वहां पहुँच गए । जहाज से उतरने के बाद एक पुल से गुजरते हैं जहाँ से थोड़ा पैदल चलकर जाना होता है मंदिर तक । मंदिर के पट खुलने में समय था, इसलिए हमने एक दुकान पर चाय पी जो हमारी पूरी गुजरात यात्रा की सबसे बेहतरीन चाय थी । मंदिर मार्ग पर एक तिराहा पड़ा जहाँ कुछ ऑटो खड़े हुए थे । ऑटो चालक सभी निकलने वाले यात्रियों से कह रहे थे कि अभी हनुमान मंदिर चलिये क्योंकि द्वारकाधीश जी का मंदिर खुलने में अभी समय है । बेट द्वारका द्वीप पर हनुमान जी का मंदिर भी है और मुख्य मंदिर से सात किमी दूर चौरासी धुना नामक एक अति प्राचीन और ऐतिहासिक महत्व का स्थान भी है परन्तु हमे समय बचाकर चलना था क्योंकि आज ही शाम को हमारी सोमनाथ की ट्रेन थी ।
द्वारकाधीश मंदिर में बहुत भीड़ थी क्योंकि पांच बजे मंदिर खुलना था और दर्शनार्थी पहले से पहुँच चुके थे और पहुंचते जा रहे थे । वहाँ पहुंचकर हमने मोबाइल, कैमरा आदि काउंटर पर जमा किया और दर्शन हेतु लाइन में लग गए । लाइन में लगने से पहले मंदिर के एक युवा पंडित जी मेरे पास स्वयं आये और मुझे वीआईपी दर्शन कराने का प्रस्ताव दिया जिसे मैंने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया । मंदिर प्रांगण में दर्शन हेतु पंक्तिबद्ध श्रद्धालुओं को एक पंडित जी संबोधित कर रहे थे जो बेट द्वारका टापू और यहाँ के मंदिर के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का वर्णन करते जा रहे थे । उनके अनुसार "इस टापू की जनसँख्या लगभग 7000 है जिसमे से लगभग 5000 मुस्लिम आबादी है । यहाँ के मंदिर की मूर्ति स्वयं रुक्मणीजी के द्वारा बनाई गई है । इस स्थान पर ही श्रीकृष्ण से भेंट हेतु सुदामा आये थे आदि आदि ।"
मंदिर में प्रसाद नहीं चढ़ता सिर्फ तुलसी पत्र की माला चढ़ती है । मुख्य मंदिर से लगे हुए कुछ मंदिर और हैं जैसे रुक्मणी जी और सत्यभामा जी के मंदिर । सभी मंदिरों में एक के बाद एक जाना होता है । वहीँ एक मंदिर में पंडित जी ने सबको बैठ जाने को कहा और बताया कि यह वही स्थान है जहाँ भगवान द्वारकाधीश से भेंट करने हेतु सुदामा जी आये थे । पंडित जी ने कहा कि आज पूर्णिमा का पावन दिन है और आप सभी बहुत भाग्यवान हैं जो आज के दिन इस पवित्र स्थल पर आये हैं । उन्होंने बताया कि द्वारका स्थित मंदिर में जितने भक्त आते हैं उसके पचास प्रतिशत लोग ही यहां भेंट-द्वारका पहुँच पाते हैं । भगवान् का निवास तो बेट द्वारका ही है, द्वारका तो उनका कार्यालय है । लोग कार्यालय में अर्जी लगाकर ही वापस लौट जाते हैं । यहाँ पर चावल चढ़ता है, जो लोग चावल लेकर आये थे उन्हें पंडितजी ने अर्पित करने को कहा । और सभी दर्शनार्थियों को उन्होंने थोड़े थोड़े चावल दिए और कहा कि इसे घर जाकर आप अपने भंडार में रखे हुए चावल में मिला लीजियेगा ।
वापिसी में फिर नौका में यात्रा करते हुए हम लगभग साढ़े छै बजे हम उस स्थान पर पहुँच गये जहाँ हमारी गाड़ी थी ।
यह मंदिर द्वारका शहर के बाहरी क्षेत्र में है । हम जब यहाँ पहुंचे तो मंदिर परिसर तो खुला था पर भीतर मुख्य मंदिर के द्वार बंद थे । ड्राइवर ने बताया कि यह मंदिर हर थोड़ी थोड़ी देर में खोला और बंद किया जाता है । कुछ देर मंदिर परिसर में ही रहे, यहाँ सभी दर्शनार्थियों को मंदिर के कर्मचारियों द्वारा पानी पिलाया जाता है । परिसर में कुछ छोटे छोटे मंदिर और भी हैं । जब काफी लोग इकठ्ठा हो गए तो मंदिर का द्वार खोल दिया गया । यहाँ भी एक पंडित जी द्वारा दर्शनार्थियों को संबोधित किया गया । उन्होंने इस मंदिर के बारे में हमें यह बताया कि-
"एक बार श्रीकृष्ण से मिलने उनके गुरु ऋषि दुर्वासा आये । श्रीकृष्ण और उनकी पत्नी, रुक्मणी देवी स्वयं ऋषि दुर्वासा को लेने जंगल गए । उनका रथ स्वयं श्रीकृष्ण और रुक्मणी देवी खींच रहे थे । चलते चलते रुक्मणी जी को प्यास लग आई तो भगवान कृष्ण ने रानी के लिए धरती धरती में लाठी मारकर गंगा का मीठा और पवित्र पानी प्राप्त किया । ऋषि दुर्वासा को यह देखकर क्रोध आ गया कि गुरु से पानी का पूछे बिना रुक्मणी जी ने कैसे पानी पी लिया। उन्होंने रुक्मणी जी को श्राप दे दिया । जिसके फलस्वरूप रुक्मणी जी बारह वर्ष कृष्ण से अलग रही। इसलिए यह मंदिर द्वारका से बाहर स्थित है ।"
पंडितजी ने बताया कि यहाँ जलसेवा हेतु पानी के टैंकर आते हैं और उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से अपने पितरों के नाम पर जलसेवा के लिए दान करने की अपील भी की ।
शाम 7:30 बजे हम लोग वापस स्टेशन आ गए । 8:30 पर ट्रेन थी । डिनर करने के लिए समय नहीं था इसलिए हमने खाना पैक करवा लिया ट्रैन में खाने के लिए । ट्रेन सही समय पर आ गई । भोजन करने के बाद सभी लोग सो गए । ट्रैन का सोमनाथ पहुँचने का समय 5:25 है । अलार्म लगाने की कोई जरुरत नहीं थी क्योंकि सोमनाथ स्टेशन टर्मिनल है जहाँ रेलमार्ग समाप्त हो जाता है इसलिए सोते हुए आगे निकल जाने की भी कोई टेंशन नहीं थी ।
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डेढ़ बजे हमारी टैक्सी आ गई । सब तैयार ही थे । हमारा पहला पड़ाव था नागेश्वर मंदिर ।
नागेश्वर मंदिर
नागेश्वर, भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है । यह द्वारका से 18 किलोमीटर दूर नगर के बाहरी क्षेत्र में स्थित है । मंदिर के सामने भगवान शिव की बहुत विशाल और अतिसुन्दर प्रतिमा है जो बहुत दूर से ही दिखाई देने लगती है । प्रतिमा के आसपास बहुत से कबूतर मंडरा रहे थे । सबसे पहले बच्चों ने कबूतरों को दाना खिलाया । इस दौरान मैंने कुछ फोटो लीं । नागेश्वर मंदिर वीरान जगह पर बना हुआ है । देखकर आश्चर्य हुआ कि मंदिर के आसपास कोई गाँव या बस्ती नहीं है । निकटतम शहर द्वारका ही है । द्वारकाधीश मंदिर में जितनी भीड़भाड़ थी, यहाँ उसका पांच प्रतिशत भी नहीं थी । यहाँ बस आम शिवमंदिरों जितनी भीड़ थी ।![]() |
| जयश्री और अर्नव |
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| नागेश्वर मंदिर के सामने सपना और अर्नव |
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मंदिर के भीतर कैमरा, मोबाइल आदि ले जाने की कोई मनाही नहीं है परंतु फोटोग्राफी/वीडियोग्राफी करना मना है । मंदिर में प्रवेश करने के बाद एक सभाग्रह पड़ता है जिसमे पूजा सामग्री, प्रसाद इत्यादि की दुकानें हैं । उसके बाद गर्भगृह जो थोड़ा निचले स्तर पर है जिसमें शिवलिंग है । मतलब दर्शन के लिए थोड़ा नीचे की ओर देखना पड़ता है । दर्शन बड़े इत्मीनान से हो गए । शिवलिंग पर चांदी का आवरण है और ऊपर एक नाग की आकृति है । एक निश्चित शुल्क देकर गर्भगृह में अभिषेक करने की व्यवस्था भी है । इस सुविधा का लाभ शर्माजी ने उठाया ।
बाहर निकलकर मैंने नारियल पानी पिया फिर हम सबने गोपी तालाब की ओर प्रस्थान किया ।
गोपी तालाब
इसके बाद हम पहुंचे गोपी तालाब । गोपी तालाब नागेश्वर मंदिर से ज्यादा दूर नहीं है । माना जाता है कि श्रीकृष्ण के वियोग में गोपियों ने यहाँ अपने प्राण त्यागे थे । यह भी कहा जाता है कि इसी स्थान पर अर्जुन का गांडीव (धनुष) असफल हो गया था ।गोपी तालाब की और उसके आसपास मिट्टी पीली है और बहुत ही मुलायम है, इसे गोपी चन्दन कहते हैं । गोपी चन्दन यहाँ स्थित दुकानों पर विक्रय हेतु भी उपलब्ध है । गोपी तालाब के किनारे एक कदम्ब का पेड़ है जिस पर श्रद्धालुओं द्वारा बांधे गये बहुत से मन्नत के धागे बंधे हुए थे । वहीँ किनारे स्थानीय लोगों द्वारा बनवाये हुए कुछ मंदिर हैं । कुछ दुकानें भी लगी हुई थीं । इसके बाद हम निकल पड़े बेट-द्वारका की ओर ।
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| गोपी तालाब |
बेट-द्वारका
कहते हैं कि भगवान कृष्ण और उनके बाल सखा सुदामा की भेंट इस स्थान पर ही हुई थी इसलिए इसे भेंट द्वारका या बेट द्वारका कहा जाता है ।
द्वारका शहर से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है बेट द्वारका । बेट द्वारका समुद्र में एक टापू है जहाँ ओखा से जहाज द्वारा जाया जाता है । समुद्र 160 किलोमीटर तक फैला है उसके बाद पाकिस्तान का कराची शहर है ।
ओखा में ड्राइवर ने हमे वहां छोड़ा जहाँ से बेट द्वारका जाने हेतु फेरी/छोटा जहाज मिलता है । लगभग पांच मिनट पैदल चलकर हम जहाज तक पहुंचे । एक जहाज जो पूरा भर चूका था, जा रहा था और दूसरा अभी अभी लगा था जिसमे हम बैठे । जल्दी ही वो भी भर गया । लगभग सौ से डेढ़ सौ लोग भरे गये थे उसमे जो निश्चित ही क्षमता से अधिक थे । सागर में बहुत से जहाज खड़े हुए थे जो मुख्य रूप से मछली पकड़ने हेतु उपयोग में लाये जाते हैं । यहाँ ओखा में मुस्लिमों की आबादी बहुत है और अधिकतर जहाज उन्ही के हैं ।
जहाज से लगभग आधे घंटे लगते है बेट द्वारका पहुँचने में । समुद्र में जहाज पर यात्रा करना बहुत ही आनंददायक और रोमांचक अनुभव है । विशेषकर बच्चों को तो बहुत ही आनन्द आया । मंदिर खुलने का समय शाम को पांच बजे है और साढ़े चार बजे वहां पहुँच गए । जहाज से उतरने के बाद एक पुल से गुजरते हैं जहाँ से थोड़ा पैदल चलकर जाना होता है मंदिर तक । मंदिर के पट खुलने में समय था, इसलिए हमने एक दुकान पर चाय पी जो हमारी पूरी गुजरात यात्रा की सबसे बेहतरीन चाय थी । मंदिर मार्ग पर एक तिराहा पड़ा जहाँ कुछ ऑटो खड़े हुए थे । ऑटो चालक सभी निकलने वाले यात्रियों से कह रहे थे कि अभी हनुमान मंदिर चलिये क्योंकि द्वारकाधीश जी का मंदिर खुलने में अभी समय है । बेट द्वारका द्वीप पर हनुमान जी का मंदिर भी है और मुख्य मंदिर से सात किमी दूर चौरासी धुना नामक एक अति प्राचीन और ऐतिहासिक महत्व का स्थान भी है परन्तु हमे समय बचाकर चलना था क्योंकि आज ही शाम को हमारी सोमनाथ की ट्रेन थी ।
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| समुन्दर को निहारते शर्माजी |
द्वारकाधीश मंदिर में बहुत भीड़ थी क्योंकि पांच बजे मंदिर खुलना था और दर्शनार्थी पहले से पहुँच चुके थे और पहुंचते जा रहे थे । वहाँ पहुंचकर हमने मोबाइल, कैमरा आदि काउंटर पर जमा किया और दर्शन हेतु लाइन में लग गए । लाइन में लगने से पहले मंदिर के एक युवा पंडित जी मेरे पास स्वयं आये और मुझे वीआईपी दर्शन कराने का प्रस्ताव दिया जिसे मैंने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया । मंदिर प्रांगण में दर्शन हेतु पंक्तिबद्ध श्रद्धालुओं को एक पंडित जी संबोधित कर रहे थे जो बेट द्वारका टापू और यहाँ के मंदिर के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का वर्णन करते जा रहे थे । उनके अनुसार "इस टापू की जनसँख्या लगभग 7000 है जिसमे से लगभग 5000 मुस्लिम आबादी है । यहाँ के मंदिर की मूर्ति स्वयं रुक्मणीजी के द्वारा बनाई गई है । इस स्थान पर ही श्रीकृष्ण से भेंट हेतु सुदामा आये थे आदि आदि ।"
मंदिर में प्रसाद नहीं चढ़ता सिर्फ तुलसी पत्र की माला चढ़ती है । मुख्य मंदिर से लगे हुए कुछ मंदिर और हैं जैसे रुक्मणी जी और सत्यभामा जी के मंदिर । सभी मंदिरों में एक के बाद एक जाना होता है । वहीँ एक मंदिर में पंडित जी ने सबको बैठ जाने को कहा और बताया कि यह वही स्थान है जहाँ भगवान द्वारकाधीश से भेंट करने हेतु सुदामा जी आये थे । पंडित जी ने कहा कि आज पूर्णिमा का पावन दिन है और आप सभी बहुत भाग्यवान हैं जो आज के दिन इस पवित्र स्थल पर आये हैं । उन्होंने बताया कि द्वारका स्थित मंदिर में जितने भक्त आते हैं उसके पचास प्रतिशत लोग ही यहां भेंट-द्वारका पहुँच पाते हैं । भगवान् का निवास तो बेट द्वारका ही है, द्वारका तो उनका कार्यालय है । लोग कार्यालय में अर्जी लगाकर ही वापस लौट जाते हैं । यहाँ पर चावल चढ़ता है, जो लोग चावल लेकर आये थे उन्हें पंडितजी ने अर्पित करने को कहा । और सभी दर्शनार्थियों को उन्होंने थोड़े थोड़े चावल दिए और कहा कि इसे घर जाकर आप अपने भंडार में रखे हुए चावल में मिला लीजियेगा ।
वापिसी में फिर नौका में यात्रा करते हुए हम लगभग साढ़े छै बजे हम उस स्थान पर पहुँच गये जहाँ हमारी गाड़ी थी ।
रुक्मणी मंदिर
यह मंदिर द्वारका शहर के बाहरी क्षेत्र में है । हम जब यहाँ पहुंचे तो मंदिर परिसर तो खुला था पर भीतर मुख्य मंदिर के द्वार बंद थे । ड्राइवर ने बताया कि यह मंदिर हर थोड़ी थोड़ी देर में खोला और बंद किया जाता है । कुछ देर मंदिर परिसर में ही रहे, यहाँ सभी दर्शनार्थियों को मंदिर के कर्मचारियों द्वारा पानी पिलाया जाता है । परिसर में कुछ छोटे छोटे मंदिर और भी हैं । जब काफी लोग इकठ्ठा हो गए तो मंदिर का द्वार खोल दिया गया । यहाँ भी एक पंडित जी द्वारा दर्शनार्थियों को संबोधित किया गया । उन्होंने इस मंदिर के बारे में हमें यह बताया कि-
"एक बार श्रीकृष्ण से मिलने उनके गुरु ऋषि दुर्वासा आये । श्रीकृष्ण और उनकी पत्नी, रुक्मणी देवी स्वयं ऋषि दुर्वासा को लेने जंगल गए । उनका रथ स्वयं श्रीकृष्ण और रुक्मणी देवी खींच रहे थे । चलते चलते रुक्मणी जी को प्यास लग आई तो भगवान कृष्ण ने रानी के लिए धरती धरती में लाठी मारकर गंगा का मीठा और पवित्र पानी प्राप्त किया । ऋषि दुर्वासा को यह देखकर क्रोध आ गया कि गुरु से पानी का पूछे बिना रुक्मणी जी ने कैसे पानी पी लिया। उन्होंने रुक्मणी जी को श्राप दे दिया । जिसके फलस्वरूप रुक्मणी जी बारह वर्ष कृष्ण से अलग रही। इसलिए यह मंदिर द्वारका से बाहर स्थित है ।"
पंडितजी ने बताया कि यहाँ जलसेवा हेतु पानी के टैंकर आते हैं और उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से अपने पितरों के नाम पर जलसेवा के लिए दान करने की अपील भी की ।
शाम 7:30 बजे हम लोग वापस स्टेशन आ गए । 8:30 पर ट्रेन थी । डिनर करने के लिए समय नहीं था इसलिए हमने खाना पैक करवा लिया ट्रैन में खाने के लिए । ट्रेन सही समय पर आ गई । भोजन करने के बाद सभी लोग सो गए । ट्रैन का सोमनाथ पहुँचने का समय 5:25 है । अलार्म लगाने की कोई जरुरत नहीं थी क्योंकि सोमनाथ स्टेशन टर्मिनल है जहाँ रेलमार्ग समाप्त हो जाता है इसलिए सोते हुए आगे निकल जाने की भी कोई टेंशन नहीं थी ।










