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भाग 1
भाग 2
नन्दगाँव से हम बिना कहीं रुके सीधा मथुरा पहुंचे । होटल पहुंचकर हम सबने एक भरपूर नींद ली । खाना तो छोले भटूरों के रूप में हो ही चुका था गोवर्धन में । योजना तो पहले यह थी कि आज शेष बचे दिन में मथुरा शहर के सारे बचे हुए प्रमुख दर्शनीय स्थल हो जायेंगे (जन्मभूमि मंदिर को छोड़कर) पर अफ़सोस, नींद खुली लगभग साढ़े पांच बजे और तैयार होते होते छै सवा छै बज गए । तब हमने अपने कार्यक्रम को द्वारकाधीश मंदिर और विश्राम घाट तक ही सीमित किया ।
द्वारकाधीश मंदिर विशेष रूप से अपने हिंडोलों (झूलों) के त्यौहार के लिए प्रसिद्ध है जो श्रावण मास के अंत में मनाया जाता है ।
भाग 1
भाग 2
नन्दगाँव से हम बिना कहीं रुके सीधा मथुरा पहुंचे । होटल पहुंचकर हम सबने एक भरपूर नींद ली । खाना तो छोले भटूरों के रूप में हो ही चुका था गोवर्धन में । योजना तो पहले यह थी कि आज शेष बचे दिन में मथुरा शहर के सारे बचे हुए प्रमुख दर्शनीय स्थल हो जायेंगे (जन्मभूमि मंदिर को छोड़कर) पर अफ़सोस, नींद खुली लगभग साढ़े पांच बजे और तैयार होते होते छै सवा छै बज गए । तब हमने अपने कार्यक्रम को द्वारकाधीश मंदिर और विश्राम घाट तक ही सीमित किया ।
द्वारकाधीश मंदिर
लगभग पौने सात बजे हम पहुंच द्वारकाधीश मन्दिर पहुँच गए । यह मंदिर सेठ गोकुलदास जी जो कि ग्वालियर रियासत में खजांची थे ने सन् 1814 में बनवाया था । आजकल इसका प्रबन्ध बल्लभाचार्य सम्प्रदाय देखता है । श्रीकृष्ण को ही द्वारका का राजा कहा जाता है, उन्ही के नाम पर इस मंदिर का यह नाम पड़ा । इस मंदिर के भीतर बेहतरीन चित्रकला और नक्काशी देखने को मिलती है । यहां राधा कृष्ण की प्रतिमा के अलावा और भी कुछ देवी देवताओं की प्रतिमाएं हैं ।द्वारकाधीश मंदिर विशेष रूप से अपने हिंडोलों (झूलों) के त्यौहार के लिए प्रसिद्ध है जो श्रावण मास के अंत में मनाया जाता है ।
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| द्वारकाधीश मन्दिर के परिसर में |
विश्राम घाट
द्वारकाधीश मंदिर विश्राम घाट के बिलकुल समीप ही है । कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने कंस के वध के पश्चात् यमुना नदी के इस तट पर विश्राम किया था इसलिए इसका नाम विश्राम घाट पड़ा ।
हम लोग जब विश्राम घाट पहुंचे तो यमुना जी की सांयकालीन आरती प्रारम्भ होने ही वाली थी । संयोग और सौभाग्य से हम लोगों को भी आरती में सम्मिलित होने का अवसर मिल गया । आरती के बाद हमने यमुना नदी में नौका-विहार किया ।
घाट से बाहर आकर हमने बच्चों के लिए खिलौने, कपड़े आदि खरीदे । मैंने अपने लिए एक टीशर्ट ली जिसमे आगे पीछे कई जगह "राधे" अंकित किया हुआ था, अगले दिन के लिए कुछ विशेष और अलग पहनने के उद्देश्य से 😂
फिर एक सायकल रिक्शा की सवारी का आनन्द उठाते हुए हमलोग सीधा होटल पहुंचे और खाना खाया । रूम पर पहुंचकर सबसे पहले टीवी ऑन किया क्योंकि उस दिन वर्ल्ड टी20 कप में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण मैच खेला जा रहा था । एक पारी हो चुकी थी, सिर्फ दूसरी पारी देखने को मिली जिसमें विराट कोहली ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए एक लगभग हारा हुआ मैच जिताया था ।
28-03-2016
आज मथुरा में हमारा तीसरा और अंतिम दिन था जिसमे हमे वृन्दावन के ख़ास ख़ास स्थलों के दर्शन करना था । सुबह हम जल्दी ही निकल पड़े । सबसे पहले ड्राईवर ने एक ऐंसे स्थान पर गाड़ी रोकी जहाँ 4-5 महत्वपूर्ण मंदिर पास पास हैं । ड्राईवर की सलाह के अनुसार हमने यहाँ एक गाइड (पंडित) किया वो सबसे पहले हमे लेकर गया श्री गोविन्ददेव मंदिर ।
गोविन्द देव मंदिर
इस मंदिर का निर्माण सन् 1590 ई. में आमेर के राजा भगवान् दास के पुत्र राजा मानसिंह ने करवाया था । बताया जाता कि इस मंदिर के निर्माण में लगभग दस वर्ष का समय लगा था । यह मंदिर सात मंजिला था जिसे तुड़वा कर छोटा कर दिया गया था मुगल शासक औरंगजेब द्वारा ।
इसके बाद गाइड हमे एक अन्य मंदिर ले गया जिसका नाम मुझे याद नहीं आ रहा । मंदिर के बाहर ही उसने कहा कि माला लेकर मंदिर में जाइये हमने माला खरीदी और मंदिर में प्रवेश किया । मंदिर के पुजारी जी ने बड़े ही प्रेमपूर्वक हमें भगवान की प्रतिमा के समक्ष बिठाया और अपना खेल शुरू किया, धार्मिक प्रलोभन और धार्मिक ब्लैकमेलिंग का खेल । गाइड के कहने पर खरीदी गई माला का उद्देश्य अब समझ में आ गया था, उसी माला को हाथ में लेकर हमें संकल्प करने और दान करने को कहा गया । अनिष्ट होने का भय भी दिखाया गया । हमने श्रद्धानुसार जो दान दक्षिणा दी उससे पुजारी जी संतुष्ट नहीं हुए । आशानुरूप धन ना मिलने की बात पुजारी ने गाइड को बताई तो गाइड हमसे नाराज हो गया । हालाँकि गाइड की फीस हमने पहले ही तय की हुई थी जो हमने बाद में दी भी । पर पुजारी से मिलने वाले उम्मीद से कम कमीशन की जानकारी मिलते ही वह तिलमिला गया और उसने अपना असली रंग दिखा दिया । फिर उसने कहा कि यहाँ के सब मंदिर हो गए हैं अब आप अपनी गाड़ी में बैठिये और वृन्दावन के अन्य मंदिर देखिये । हालाँकि मुझे पता था कि कुछ रह गया है, परन्तु समय भी कम था और अब मैं स्वयं भी उस लोभी पंडित (गाइड) से पीछा छुड़ाना चाह रहा था ।
जहाँ ड्राइवर ने हमे छोड़ा वहां से मंदिर तक एक किलोमीटर से भी ज्यादा यात्रा करनी पड़ी । मंदिर तक पूरा मार्ग और मंदिर के समीप भी अत्यधिक व्यस्त और भीड़भाड़ भरा क्षेत्र है । श्री बांके बिहारी जी के मंदिर में कपडे का पर्दा लगा रहता है जो हर कुछ मिनट में खोला व् बंद किया जाता है ।
वापस हम लोग पुनः जब वहां पहुंचे जहां ड्राइवर ने छोड़ा था तो ड्राइवर गाड़ी सहित नदारद था । उसको फोन लगाया तो उसका मोबाइल बंद बता रहा था । बहुत देर तक उसका मोबाइल बंद ही बताता रहा । वैसे भी अब तक सब लोग थक चुके थे और ड्राइवर की इस हरकत से सबका गुस्सा सातवें आसमान पर था । अच्छा हुआ मेरे पास होटल के रिसेप्शन का नम्बर था , उनको फोन लगाया तो ड्राइवर तुरंत हमारे सामने हाज़िर हो गया । दरअसल उसके पास दो मोबाइल थे जिनमें से एक मोबाइल बंद हो गया था और उसी का नम्बर हमारे पास था । वहाँ थोड़ी दूर पर पार्किंग स्थल था इसलिए वो गाड़ी सहित वही पहुच गया था किसी पुलिस वाले के आदेश से । ड्राइवर थोड़ा सीधा सादा था इसलिए उसको ज्यादा खरी खोटी सुनाने का मेरा मन नहीं किया, यह काम होटल के मैनेजर ने कर दिया था बाद में हमारे सामने । हालाँकि मैं ऐँसा बिलकुल नहीं चाहता था ।
बाहर से देखने पर ही समझ में आ गया था कि निश्चित ही यह मथुरा वृन्दावन का सबसे भव्य मंदिर है । बहुत अफ़सोस हुआ ।
प्रेम मंदिर का शिलान्यास कृपालु जी महाराज द्वारा सन् 2001 में किया गया था जो लगभग ग्यारह वर्ष में तैयार हुआ । लागभग 100 करोड़ रूपये की धनराशि से निर्मित यह मंदिर 54 एकड़ भूमि पर फैला हुआ है । उच्चस्तरीय भारतीय शिल्पकला की एक अनूठी, बेजोड़ मिसाल है प्रेम मंदिर !
प्रवेश द्वार पर सुरक्षा कर्मचारी पूरी मुस्तैदी से डटे हुए थे । मैंने सोचा इनसे निवेदन करके मंदिर के प्रांगड़ में जाने की जुगाड़ लगाई जाए । वहीँ एक दादा और उनका पोता भी मंदिर में जाने के लिए उनसे बार बार विनती कर रहे थे पर वो मानने को बिलकुल तैयार नहीं थे, बल्कि पोता जब जबरन अंदर जाने लगा तो प्रहरियों ने उसको लगभग धकेलते हुए बाहर कर दिया । यह देखकर मैंने भी हार मान ली और बाहर से ही प्रेममन्दिर की कुछ फोटो खींचकर चुपचाप अपनी गाड़ी में बैठ गया । मंदिर खुलने तक प्रतीक्षा नहीं की जा सकती थी क्योंकि आज ही हमारी वापसी की ट्रेन थी लगभग चार बजे ।
फिर हमने सीधे मथुरा का रुख किया । रास्ते में प्रसिद्ध ब्रजवासी स्वीट से बहुत सारे पेड़े खरीदे, क्योंकि अगर आप मथुरा की यात्रा करके आ रहे हैं और अपने स्वजनों के लिए मथुरा के पेड़े ना लाये तो बहुत बड़ा अपराध माना जाता है । 😁
लगभग डेढ़ बजे हम अपने होटल पहुँच गये । तैयारी तो सुबह ही पूरी कर ली थी । होटल के रेस्टॉरेंट में अंतिम बार भोजन किया और रेलवे स्टेशन की ओर प्रस्थान किया । ट्रैन आने तक वेटिंग रूम में बच्चों ने खूब धमा चौंकड़ी मचाई जबकि बड़े लोग सब थके हारे हुए बैठे रहे । पता नहीं बच्चों में इतनी ऊर्जा कहाँ से आ जाती है ।
साढ़े चार बजे हमारी ट्रेन आई और हम मथुरा की मीठी यादें दिल में संजोये वापस अपने घर की ओर चल पड़े । यूँ तो कृष्ण जन्म और उनकी लीलाओं से सम्बंधित कई कहानियां मैंने सुनी हैं परंतु ब्रज क्षेत्र की पावन भूमि पर यात्रा करते हुए श्रीकृष्ण की कथाओं के स्मरण ने मुझे एक ऐँसा अनोखा अहसास दिया जो सदैव हृदय में रहेगा ।
इसके बाद गाइड हमे एक अन्य मंदिर ले गया जिसका नाम मुझे याद नहीं आ रहा । मंदिर के बाहर ही उसने कहा कि माला लेकर मंदिर में जाइये हमने माला खरीदी और मंदिर में प्रवेश किया । मंदिर के पुजारी जी ने बड़े ही प्रेमपूर्वक हमें भगवान की प्रतिमा के समक्ष बिठाया और अपना खेल शुरू किया, धार्मिक प्रलोभन और धार्मिक ब्लैकमेलिंग का खेल । गाइड के कहने पर खरीदी गई माला का उद्देश्य अब समझ में आ गया था, उसी माला को हाथ में लेकर हमें संकल्प करने और दान करने को कहा गया । अनिष्ट होने का भय भी दिखाया गया । हमने श्रद्धानुसार जो दान दक्षिणा दी उससे पुजारी जी संतुष्ट नहीं हुए । आशानुरूप धन ना मिलने की बात पुजारी ने गाइड को बताई तो गाइड हमसे नाराज हो गया । हालाँकि गाइड की फीस हमने पहले ही तय की हुई थी जो हमने बाद में दी भी । पर पुजारी से मिलने वाले उम्मीद से कम कमीशन की जानकारी मिलते ही वह तिलमिला गया और उसने अपना असली रंग दिखा दिया । फिर उसने कहा कि यहाँ के सब मंदिर हो गए हैं अब आप अपनी गाड़ी में बैठिये और वृन्दावन के अन्य मंदिर देखिये । हालाँकि मुझे पता था कि कुछ रह गया है, परन्तु समय भी कम था और अब मैं स्वयं भी उस लोभी पंडित (गाइड) से पीछा छुड़ाना चाह रहा था ।
कांच मंदिर
उसके बाद हम पहुंचे वृन्दावन के एक अन्य मंदिर "कांच का मंदिर" । मंदिर के बाह्य भाग में कांच की कोई कारीगरी मुझे दिखी नहीं बल्कि मंदिर की भीतरी छत और दीवाल में अवश्य कांच की बहुत सी कलाकृतियां थीं ।
इस मंदिर का मुख्य आकर्षण यहाँ पर गुफानुमा बनाई गई गैलरी में विद्युत् से संचालित झांकी थी जिसमें ना सिर्फ बच्चों का बल्कि हम सभी का मन प्रसन्न हो गया ।
निधिवन का नाम मैंने बहुत सुना था । निधिवन में राधा कृष्ण रास रचाते थे और कहते हैं कि आज भी रात में यहाँ राधा कृष्ण रास रचाते हैं । जब मैंने ड्राइवर से निधिवन चलने को कहा तो उसने कहा कि निधिवन तो वहीँ पड़ता है जहाँ गाइड आपको लेकर गया था, क्या उसने आपको नहीं बताया ? मैंने कोई जवाब नहीं दिया बस मन मसोस कर रह गया और एक बार फिर गाइड के प्रति मन क्रोध से भर गया । आज हमारे पास समय भी ज्यादा नहीं था इसलिए वापस निधिवन जाने का कोई इरादा नहीं किया ।
बांके बिहारी मंदिर
इसके बाद हम पहुंचे वृन्दावन के सबसे प्रमुख मंदिरों में से एक श्री बांके बिहारी मंदिर । इसका निर्माण सन् 1964 में स्वामी हरिदास जी द्वारा करवाया गया था ।जहाँ ड्राइवर ने हमे छोड़ा वहां से मंदिर तक एक किलोमीटर से भी ज्यादा यात्रा करनी पड़ी । मंदिर तक पूरा मार्ग और मंदिर के समीप भी अत्यधिक व्यस्त और भीड़भाड़ भरा क्षेत्र है । श्री बांके बिहारी जी के मंदिर में कपडे का पर्दा लगा रहता है जो हर कुछ मिनट में खोला व् बंद किया जाता है ।
वापस हम लोग पुनः जब वहां पहुंचे जहां ड्राइवर ने छोड़ा था तो ड्राइवर गाड़ी सहित नदारद था । उसको फोन लगाया तो उसका मोबाइल बंद बता रहा था । बहुत देर तक उसका मोबाइल बंद ही बताता रहा । वैसे भी अब तक सब लोग थक चुके थे और ड्राइवर की इस हरकत से सबका गुस्सा सातवें आसमान पर था । अच्छा हुआ मेरे पास होटल के रिसेप्शन का नम्बर था , उनको फोन लगाया तो ड्राइवर तुरंत हमारे सामने हाज़िर हो गया । दरअसल उसके पास दो मोबाइल थे जिनमें से एक मोबाइल बंद हो गया था और उसी का नम्बर हमारे पास था । वहाँ थोड़ी दूर पर पार्किंग स्थल था इसलिए वो गाड़ी सहित वही पहुच गया था किसी पुलिस वाले के आदेश से । ड्राइवर थोड़ा सीधा सादा था इसलिए उसको ज्यादा खरी खोटी सुनाने का मेरा मन नहीं किया, यह काम होटल के मैनेजर ने कर दिया था बाद में हमारे सामने । हालाँकि मैं ऐँसा बिलकुल नहीं चाहता था ।
इस्कोन मंदिर
इसके बाद हमारा अगला पड़ाव था इस्कोन टेम्पल । इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर जांच प्रक्रिया से गुजरना होता है । यहां विदेशी महिला पुरुष राधा कृष्ण की भक्ति में डूबे, नृत्य करते, भजन कीर्तन करते हुए देखे जा सकते हैं । इसे अंग्रेजों का मंदिर भी कहा जाता है ।प्रेम-मंदिर
इसके बाद ड्राइवर हमे लेकर गया प्रेम मंदिर ।जब हम पहुंचे उसके पांच सात मिनट पहले ही ठीक बारह बजे मंदिर का प्रवेश द्वार बंद हुआ था । हालाँकि मंदिर परिसर में काफी लोग विचरण कर रहे थे पर वे सभी लोग 12 बजे से पहले द्वार बंद होने के पूर्व प्रवेश कर चुके थे । अगर मंदिर के टाइमिंग का मुझे पहले से पता होता तो हम इस्कोन मंदिर से पहले प्रेम मंदिर ही जाते क्योंकि इस मंदिर के बारे में मैने काफी कुछ पहले से सुना हुआ था ।बाहर से देखने पर ही समझ में आ गया था कि निश्चित ही यह मथुरा वृन्दावन का सबसे भव्य मंदिर है । बहुत अफ़सोस हुआ ।
प्रेम मंदिर का शिलान्यास कृपालु जी महाराज द्वारा सन् 2001 में किया गया था जो लगभग ग्यारह वर्ष में तैयार हुआ । लागभग 100 करोड़ रूपये की धनराशि से निर्मित यह मंदिर 54 एकड़ भूमि पर फैला हुआ है । उच्चस्तरीय भारतीय शिल्पकला की एक अनूठी, बेजोड़ मिसाल है प्रेम मंदिर !
प्रवेश द्वार पर सुरक्षा कर्मचारी पूरी मुस्तैदी से डटे हुए थे । मैंने सोचा इनसे निवेदन करके मंदिर के प्रांगड़ में जाने की जुगाड़ लगाई जाए । वहीँ एक दादा और उनका पोता भी मंदिर में जाने के लिए उनसे बार बार विनती कर रहे थे पर वो मानने को बिलकुल तैयार नहीं थे, बल्कि पोता जब जबरन अंदर जाने लगा तो प्रहरियों ने उसको लगभग धकेलते हुए बाहर कर दिया । यह देखकर मैंने भी हार मान ली और बाहर से ही प्रेममन्दिर की कुछ फोटो खींचकर चुपचाप अपनी गाड़ी में बैठ गया । मंदिर खुलने तक प्रतीक्षा नहीं की जा सकती थी क्योंकि आज ही हमारी वापसी की ट्रेन थी लगभग चार बजे ।
फिर हमने सीधे मथुरा का रुख किया । रास्ते में प्रसिद्ध ब्रजवासी स्वीट से बहुत सारे पेड़े खरीदे, क्योंकि अगर आप मथुरा की यात्रा करके आ रहे हैं और अपने स्वजनों के लिए मथुरा के पेड़े ना लाये तो बहुत बड़ा अपराध माना जाता है । 😁
लगभग डेढ़ बजे हम अपने होटल पहुँच गये । तैयारी तो सुबह ही पूरी कर ली थी । होटल के रेस्टॉरेंट में अंतिम बार भोजन किया और रेलवे स्टेशन की ओर प्रस्थान किया । ट्रैन आने तक वेटिंग रूम में बच्चों ने खूब धमा चौंकड़ी मचाई जबकि बड़े लोग सब थके हारे हुए बैठे रहे । पता नहीं बच्चों में इतनी ऊर्जा कहाँ से आ जाती है ।
साढ़े चार बजे हमारी ट्रेन आई और हम मथुरा की मीठी यादें दिल में संजोये वापस अपने घर की ओर चल पड़े । यूँ तो कृष्ण जन्म और उनकी लीलाओं से सम्बंधित कई कहानियां मैंने सुनी हैं परंतु ब्रज क्षेत्र की पावन भूमि पर यात्रा करते हुए श्रीकृष्ण की कथाओं के स्मरण ने मुझे एक ऐँसा अनोखा अहसास दिया जो सदैव हृदय में रहेगा ।





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