पिछले भाग से आगे....
मथुरा में आज हमारा दूसरा दिन था । सुबह हम सब साढ़े सात बजे तक नहाकर रेडी हो चुके थे । होटल के प्रबन्धक ने कल शाम को ही बता दिया था कि सुबह सात- साढ़े सात बजे आपका ड्राईवर आ जायेगा ।
राधा रानी के मन्दिर कंपाउंड में सेल्फी
अगले भाग में जारी....
मथुरा में आज हमारा दूसरा दिन था । सुबह हम सब साढ़े सात बजे तक नहाकर रेडी हो चुके थे । होटल के प्रबन्धक ने कल शाम को ही बता दिया था कि सुबह सात- साढ़े सात बजे आपका ड्राईवर आ जायेगा ।
गोवर्धन
आज हमारा पहला पड़ाव था गोवर्धन । गोवर्धन पर्वत को कौन नहीं जानता । श्रीकृष्ण ने ब्रज के वासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी तर्जनी ऊँगली पर उठाया था । गोवर्धन पर्वत को गिरिराज भी कहा जाता है । सुबह लगभग आठ बजे हम निकले । सबसे पहले रास्ते में एक छोटी सी दुकान पर स्पेशल चाय बनवाकर पी । यहाँ चाय और लस्सी हर दुकान में कुल्हड़ में दी जाती है । गोवर्धन मथुरा जिले में एक कस्बा है है जो मथुरा से 22 km की दूरी पर है । यहाँ गोवर्धन जी का एक मन्दिर बना हुआ है जिसे दानघाटी मन्दिर कहते हैं । मंदिर के बाहर ऊपरी तरफ श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाये जाने वाली झांकी बनी हुई है । मंदिर में प्रतिमा एक शिला के रूप में है जिन पर दूध चढ़ाया जाता है । मैंने भी मंदिर के द्वार पर लगी एक दुकान से दूध लिया फिर मंदिर में प्रवेश किया । दूध के बजाय उसे सफेद रंग का पानी कहूँ तो ज्यादा उचित होगा । कुछ समय हमने मंदिर के परिसर में बिताया ।
गोवर्धन पर्वत अब एक विशाल पर्वत के रूप में ना होकर पत्थरों के ढेर के रूप में हैं जो 21 km लम्बाई में फैला हुआ है । कहा जाता है कि गोवर्धन जी शनैः शनैः स्वयं धरती में समाहित होते जा रहे हैं । गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा का विशेष महत्त्व है । यह 21 km की परिक्रमा दानघाटी मंदिर के पास से ही प्रारंभ होती है । परिक्रमा पथ के किनारे कच्चा फुटपाथ बना हुआ है, जो धूप में गर्म नहीं होता क्योंकि अधिकतर श्रद्धालु नंगे पाँव परिक्रमा करते हैं । हम पैदल परिक्रमा की तयारी से नहीं गए थे इसलिए हमने गाड़ी से ही परिक्रमा की । परिक्रमा के लिए यहां ऑटो-रिक्शा भी उपलब्ध रहते हैं । मैंने देखा कि कुछ लोग दण्डौति परिक्रमा भी कर रहे हैं । दण्डौति परिक्रमा जमीन पर दंडवत लेटकर की जाती है जो एक-दो हफ्ते में पूरी होती है । परिक्रमा पथ का थोडा सा हिस्सा राजस्थान के भरतपुर जिले में आता है
परिक्रमा पूरी होते होते सबको भूख लग आई थी क्योंकि सुबह होटल से हम लोग नाश्ता किये बिना चले थे । नन्दगाँव की तरफ रूख करने से पहले कुछ नाश्ता कर लेने में ही समझदारी थी । एक दुकान पर गरमागरम छोले भटूरे दिखे । बस, फिर क्या था सबने पेट भरकर खाये । अब तक वैसे लंच का समय भी हो चुका था ।
गोवर्धन पर्वत अब एक विशाल पर्वत के रूप में ना होकर पत्थरों के ढेर के रूप में हैं जो 21 km लम्बाई में फैला हुआ है । कहा जाता है कि गोवर्धन जी शनैः शनैः स्वयं धरती में समाहित होते जा रहे हैं । गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा का विशेष महत्त्व है । यह 21 km की परिक्रमा दानघाटी मंदिर के पास से ही प्रारंभ होती है । परिक्रमा पथ के किनारे कच्चा फुटपाथ बना हुआ है, जो धूप में गर्म नहीं होता क्योंकि अधिकतर श्रद्धालु नंगे पाँव परिक्रमा करते हैं । हम पैदल परिक्रमा की तयारी से नहीं गए थे इसलिए हमने गाड़ी से ही परिक्रमा की । परिक्रमा के लिए यहां ऑटो-रिक्शा भी उपलब्ध रहते हैं । मैंने देखा कि कुछ लोग दण्डौति परिक्रमा भी कर रहे हैं । दण्डौति परिक्रमा जमीन पर दंडवत लेटकर की जाती है जो एक-दो हफ्ते में पूरी होती है । परिक्रमा पथ का थोडा सा हिस्सा राजस्थान के भरतपुर जिले में आता है
परिक्रमा पूरी होते होते सबको भूख लग आई थी क्योंकि सुबह होटल से हम लोग नाश्ता किये बिना चले थे । नन्दगाँव की तरफ रूख करने से पहले कुछ नाश्ता कर लेने में ही समझदारी थी । एक दुकान पर गरमागरम छोले भटूरे दिखे । बस, फिर क्या था सबने पेट भरकर खाये । अब तक वैसे लंच का समय भी हो चुका था ।
![]() |
| दानघाटी मन्दिर |
![]() |
| मन्दिर के ऊपर बनी झांकी से प्रभावित होकर अर्नव कह रहा था कि "मैंने अपनी ऊँगली से पर्वत उठाया है " 😂😂 |
बरसाना
बरसाना राधा रानी की जन्मस्थली होने के कारण प्रसिद्ध है । यहाँ राधा जी का एक बहुत ही सुन्दर मन्दिर एक पहाड़ी पर है जिस पर सैकड़ों सीढियां चढ़कर जाना होता है । बरसाना गाँव मथुरा से 40 km और गोवर्धन से 20 km की दूरी पर है । मन्दिर जाने के लिए बुजुर्ग और असहाय लोगों हेतु सशुल्क पालकी भी उपलब्ध हैं ।
हम जैसे ही मन्दिर के समीप पहुंचे कुछ पालकी वाले माताजी को देखकर हमारे पास आ गए कहने लगे 300 सीढियां हैं आपकी माताजी चढ़ नहीं पाएंगी, पालकी कर लीजिये, मैं भी यही चाहता था पर माँ ने पालकी में बैठने में कोई रूचि नहीं दिखाई । चढ़ते चढ़ते दो तीन बार विश्राम करते हुए हम लोग बड़े आराम से मंदिर तक पहुँच गए । मंदिर का भवन अंदर से काफी बड़ा है जहां भजन की धुन पर दो बालक राधा और कृष्ण बनकर नृत्य कर रहे थे और साथ ही कुछ श्रद्धालु भक्त भी नाच रहे थे । इतना आनंददायक और मनमोहक नजारा था कि कोई भी थिरकने को विवश हो जाये, संगीत की धुन पर मन-मयूरा भावविभोर होकर नृत्य करने को व्याकुल हो जाये । बरबस ही यह पंक्ति बार बार याद आ रही थी-
"मीठी रस से भरी राधा रानी लागे,
मने करो करो जमुनाजी को पानी लागे...
जमनाजी तो कारी कारी ,राधा गोरी गोरी,
वृन्दावन धूम मचाये ,बरसाने की छोरी"
वैष्णव सम्प्रदाय के लोगों के लिए बरसाना किसी तीर्थ से कम नहीं है । बरसाना के स्थानीय लोग राधा रानी को लाड़ली भी कहते हैं ।
"मीठी रस से भरी राधा रानी लागे,
मने करो करो जमुनाजी को पानी लागे...
जमनाजी तो कारी कारी ,राधा गोरी गोरी,
वृन्दावन धूम मचाये ,बरसाने की छोरी"
वैष्णव सम्प्रदाय के लोगों के लिए बरसाना किसी तीर्थ से कम नहीं है । बरसाना के स्थानीय लोग राधा रानी को लाड़ली भी कहते हैं ।
मन्दिर के बाहर निकलते ही वेशभूषा से पण्डित दिखने वाले एक नौजवान जो अपने आपको मन्दिर का प्रतिनिधि बता रहे था हमारे पास आये और कहने लगे, राधा रानी के भोजन का समय होने वाला है, उनको केलों का भोग लगाया जायेगा और उसका प्रसाद वितरण किया जायेगा । केले मंगवाने के लिए एक निश्चित धनराशि की माँग रख दी गई । वह आग्रह नहीं कर रहे थे बल्कि लगभग पीछे ही पड़ गये थे। उसके बाद मेरे और उनके बीच हुए संवाद का वर्णन मैं नहीं करूँगा ।
यहां एक अनोखी बात देखने को मिली, मन्दिर के बाहर, परिसर में और सीढ़ियों पर अत्यधिक संख्या में हाथ में झाड़ू लिए हुए सफाई कर्मचारी दिखे । पर आश्चर्य, उनमे से कोई भी झाड़ू लगाते हुए नहीं दिखा । सिर्फ यात्रियों से दान मांगते दिखे । उनका कहना था कि हम लोगों को दान देने से बहुत पुण्य मिलता है और दानदाता को दान का कई गुना ज्यादा प्राप्त होता है । मतलब सिर्फ पंडों का ही एकाधिकार नहीं है धार्मिक ब्लैकमेलिंग पर और धार्मिक प्रलोभन पर ।
मंदिर के सामने जब मैं बैठा था तो देखा कि एक 8-9 साल का बच्चा सीढियां गिन गिनकर चढ़ते हुए ऊपर की ओर आ रहा था । जब वह अंतिम सीढ़ी चढ़ा तो मैंने उससे पुछा कितनी हैं, तो उसने जवाब दिया, अंकल 170 सीढियां हैं ।
बरसाना लट्ठमार होली के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्द है । होली पर यहां लट्ठमार होली में शामिल होने देश विदेश के काफी तादाद में लोग आते हैं ।
मंदिर के सामने जब मैं बैठा था तो देखा कि एक 8-9 साल का बच्चा सीढियां गिन गिनकर चढ़ते हुए ऊपर की ओर आ रहा था । जब वह अंतिम सीढ़ी चढ़ा तो मैंने उससे पुछा कितनी हैं, तो उसने जवाब दिया, अंकल 170 सीढियां हैं ।
बरसाना लट्ठमार होली के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्द है । होली पर यहां लट्ठमार होली में शामिल होने देश विदेश के काफी तादाद में लोग आते हैं ।
खैर, नीचे उतरकर हमने बहुत ही स्वादिष्ट लस्सी पी । मैं आपको एक बात बताना चाहूँगा कि मथुरा क्षेत्र के पेड़े और लस्सी बहुत प्रसिद्ध है, पर स्वाद में यहां से बेहतर पेड़े मैं अन्य कुछ स्थानों पर खा चुका हूँ परन्तु बात अगर लस्सी की जाये तो मथुरा से बेहतर लस्सी मैंने अन्यत्र कहीं नहीं पी । वैसे यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है और कोई जरूरी नहीं कि आप इससे सहमत हों और एक तथ्य यह भी हैं कि मथुरा की ही अलग अलग दुकानों पर क्वालिटी भिन्न भिन्न हो सकती है ।
![]() |
| सीढियां चढ़ते समय एक जगह विश्राम करते हुए |
नंदगांव
बरसाना से 8 किमी है नंदगांव । यह छोटा सा नगर नंदीश्वर नामक पहाड़ी पर बसा हुआ है । श्रीकृष्ण के पिता नंदराय गोकुल को छोड़कर श्रीकृष्ण और ग्वालों को लेकर यहाँ आये थे, उन्हीं ने यह गांव बसाया, इसलिए यह नंदगांव कहलाया ।
यहाँ नंदराय(नंदबाबा) का एक प्रसिद्ध मंदिर है और साथ ही श्रीकृष्ण और उनके परिवार से सम्बंधित कुछ दर्शनीय स्थल और हैं । पर हम सब लोग अब तक काफी थक चुके थे इसलिए प्रमुख मंदिर अर्थात् नंदबाबा के मंदिर के अलावा और कहीं नहीं जा सके । नंदबाबा का मंदिर भी बरसाना के मंदिर की भांति काफी ऊँचाई पर है जहाँ चढ़कर जाना पड़ता है । हांलांकि यहाँ वैसी लगातार सीढियां नहीं हैं, कहीं समतल भूमि कहीं सीढियां तो कंही चढ़ाव है । मन्दिर के परिसर मैं जब हम लोग बैठे थे तो अर्नव को एक बन्दर दिखा । जब तक हमारा ध्यान जाता तब तक अर्नव उस बन्दर को पकड़ने के लिए दौड़ा और बिलकुल उसके करीब पहुँच गया । जैसे तैसे हमने अर्नव को पकड़ा और बेचारा बन्दर भी डरकर दूर हट गया । अर्नव का यह कृत्य कोई आश्चर्य का विषय नहीं था, वह आवारा कुत्तों और बकरियों के साथ भी अक्सर ऐंसा करता रहता है ।
![]() |
| नंदबाबा जी का मन्दिर |
अगले भाग में जारी....














No comments:
Post a Comment