Wednesday, December 14, 2016

सोमनाथ

सोमनाथ मंदिर..

धार्मिक आस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र और सनातन धर्म के वैभवशाली इतिहास का प्रतीक !




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ट्रैन सोमनाथ स्टेशन पर निर्धारित समय पर पहुँच गई और पहुँचते ही सबकी नींद भी खुल गई । सोमनाथ स्टेशन रेल टर्मिनल है जहाँ पर रेलमार्ग समाप्त हो जाता है । यहाँ भी रिटायरिंग रूम बुक थे, जो 8 बजे मिलने वाले थे । निवेदन करने पर हमें रूम सात बजे मिल गए । तब तक प्रतीक्षालय और प्लेटफार्म पर कुछ समय बिताया । आज मौसम बहुत खुशनुमा था ।




सोमनाथ स्टेशन पर मैं अपने नए कैमरे का परीक्षण करते हुए और शर्माजी अपनी फिटनेस का 😁😁







सोमनाथ रेलवे स्टेशन बाहर से




अहमदाबाद और द्वारका के रिटायरिंग रूम बहुत बेहतरीन थे परंतु सोमनाथ का रिटायरिंग रूम उस स्तर का नहीं था और एसी भी आवाज कर रहा था । स्नान इत्यादि करके सब तैयार हो गए । मैं और कन्हैया जी आज दिन भर के कार्यक्रम की योजना बनाने हेतु अन्वेषण या छानबीन करने के उद्देश्य से स्टेशन के बाहर निकले परन्तु स्टेशन के आसपास कुछ चहल-पहल नहीं थी और एक चाय बिस्कुट इत्यादि की छोटी सी दुकान के अलावा दूर दूर तक कोई दूकान नहीं थी । इसलिए हम पहुँच गए मंदिर के आसपास के क्षेत्र । हमें मंदिर से कुछ दूरी पर लीलावती नामक एक गेस्ट हाउस दिखा जो मंदिर ट्रस्ट द्वारा संचालित है । काफी बड़ा और सर्वसुविधायुक्त है । पता चला कि मंदिर ट्रस्ट द्वारा दो और अतिथि-गृह संचालित हैं माहेश्वरी और सागर दर्शन नाम से । पहले पता होता तो यहीं रूम बुक करते ।
खैर, दर्शनीय स्थलों में यहाँ का मुख्य आकर्षण सोमनाथ मंदिर ही है । कुछ मंदिर और हैं जो ज्यादा दूर नहीं हैं । टैक्सी हमे मिली नहीं इसलिए एक ऑटो बुक करके हम उसे स्टेशन ले गए । फिर सब उसमे सवार होकर निकल पड़े नगर भ्रमण हेतु । हमारा पहला पड़ाव था वह, जहाँ जाने की इच्छा मन में कई वर्षों से थी "श्री सोमनाथ मंदिर" ।


सोमनाथ मंदिर

भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिम में अरब सागर के तट पर स्थित है हिन्दू धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ सोमनाथ । इस धरा पर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से यह प्रथम और सबसे प्रमुख माना जाता है । कहते हैं इसकी स्थापना स्वयं चंद्रदेव( चन्द्रमा) ने की थी ।
पौराणिक कथाओं के अनुसार चन्द्रदेव ने दक्ष की 27 कन्यायों से विवाह किया था किंतु वे उनमे से एक रोहिणी नामक पत्नि को ही प्रेम और सम्मान देते थे । उनकी अन्य पत्नियों ने इसकी शिकायत अपने पिता दक्ष से की तो उन्होंने क्रोधित होकर चंद्र देव को श्राप दिया कि तुम्हारा तेज(कांति) दिन प्रतिदिन क्षीण होता रहेगा । इस श्राप से मुक्ति के लिए चन्द्र देव ने भगवान् शिव की आराधना की और तभी इस शिवलिंग की स्थापना की । यहाँ भगवान शिव प्रकट प्रकट हुए और उन्होंने चन्द्रदेव का उद्धार किया । इसका वर्णन ऋग्वेद में भी मिलता है । माना जाता है कि सृष्टि की रचना के समय भी यह ज्योतिर्लिंग विद्यमान था ।

सोमनाथ मंदिर की ख्याति सदियों से सम्पूर्ण विश्व में रही है । इस मंदिर पर 17 बार विधर्मियों ने आक्रमण किये । बार बार मंदिर को ध्वस्त किया और संपत्ति को लूटा गया । मंदिर का बार बार पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार किया जाता रहा । सन 1026 में महमूद गज़नी ने जिस शिवलिंग को खण्डित किया वही आदि शिवलिंग था ।

वर्तमान में जो मंदिर विद्यमान है इसके निर्माण का श्रेय जाता है सरदार बल्लभ भाई पटैल को । 8 मई, 1950 को मंदिर की आधार शिला सौराष्ट्र के पूर्व राजा दिग्विजय सिंह ने  रखी तथा 11 मई, 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर में ज्योतिर्लिंग स्थापित किया ।

हम जब पहुंचे तब आसमान में बादल छाए हुए थे और बारिश दस्तक दे रही थी । मंदिर के बाहर बहुत सारे कबूतर मंडरा रहे थे । कबूतरों को दाना खिलाने का विचार मेरे मन में आया परन्तु साथी सब आगे बढ़ चुके थे इसलिए मैंने सोचा कि पहले दर्शन कर लिए जाएँ । मंदिर के मुख्य द्वार से काफी पहले ही एक प्रवेश द्वार है जहाँ सुरक्षा जांच कर्मी तैनात हैं । उसके थोड़ा आगे एक सुन्दर दिग्विजय द्वार बना हुआ है जो जामनगर की राजमाता ने अपने स्वर्गीय पति की स्मृति में 1970 में बनवाया था । सोमनाथ मंदिर कला के दृष्टिकोण से बहुत ही आकर्षक है । महासागर भी मंदिर की सुंदरता और भव्यता में चार चाँद लगाता है । ऐंसा प्रतीत होता है मानो महासागर की लहरें शिव के चरण पखार रही हों । मंदिर में प्रवेश करते एक अलग ही अनुभूति हुई  ऐंसा लगा जैसे जीवन धन्य हो गया हो । शिवलिंग की छटा भी निराली और मनमोहक है । यहाँ भक्तों को गर्भगृह में तो प्रवेश नहीं मिलता परन्तु दूर से शिवलिंग पर गंगाजल से अभिषेक करने की व्यवस्था है । चढ़ाया गया जल पम्प द्वारा शिवलिंग तक पहुँचता है ।
बाहर निकलकर कुछ देर मंदिर प्रांगड़ से ही सागर दर्शन किया इतने में बूँदाबादी शुरू हो गई । फिर हम मंदिर से बाहर निकल आये । परिसर में कुछ और मंदिर भी हैं । मंदिर प्रांगड़ में शाम को एक घण्टे का 'साउंड एंड लाइट' शो होता है जिसमें सोमनाथ मंदिर के धार्मिक और ऐतिहासिक घटनाक्रम का सचित्र विवरण प्रस्तुत किया जाता है ।


सोमनाथ मुख्य मंदिर से बाहर निकलकर बायीं ओर थोड़ा सा चलकर एक और मंदिर है जिसे पुराना सोमनाथ मंदिर कहते हैं । इसका निर्माण अहिल्या बाई होल्कर ने करवाया था । यहाँ भी एक शिवलिंग स्थापित है । यहाँ सभागृह बड़ा नहीं है । मुख्य द्वार से प्रवेश कर श्रद्धालु पंक्तिबद्ध होकर गर्भगृह तक पहुँचते हैं और शिवलिंग के दर्शन कर सीधा चलते हुए दुसरे द्वार से बाहर निकलते हैं ।
दोनों मंदिरों के बाद मुझे कबूतरों को दाना खिलाने की याद आयी पर अब बारिश शुरू हो चुकी थी इसलिए सभी कबूतर कहीं शरण लिए हुए थे ।
हम अपने ऑटो में बैठे और निकल पड़े सोमनाथ के अन्य दर्शनीय स्थलों की ओर ।



पाँच पांडव गुफा

पाँच पांडव गुफा नामक यह मंदिर बाबा नारायणदास जी ने सन 1949 में बनवाया था । यह मंदिर पांडव भाइयों को समर्पित है यहाँ आदि शंकराचार्य और उनके शिष्यों की भी मूर्तियां भी हैं ।




सूर्य मंदिर

सूर्य मंदिर भी अति प्राचीन मंदिर है । इसका निर्माण भगवान सूर्य की पूजा अर्चना हेतु करवाया गया था ।


गीता मंदिर

गीता मंदिर का निर्माण बिरला परिवार द्वारा 1970 में करवाया गया था । मंदिर के सभागृह की भीतरी दीवारों पर सफ़ेद मार्बल पर गीता के श्लोकों को उकेरा गया है ।
गीता मंदिर परिसर में ही बलरामजी की गुफा, लक्ष्मीनारायण मंदिर, देहोत्सर्ग स्थल, श्री काशी विश्वनाथ मंदिर, महाप्रभुजी की बैठक आदि स्थित हैं ।











त्रिवेणी संगम

त्रिवेणी घाट या त्रिवेणी संगम तीन नदियों का संगम है कपिल, हिरन और रहस्यमयी नदी सरस्वती । कहा जाता है कि भालुका तीर्थ में तीर लगने के बाद भगवान् श्री कृष्ण घायल अवस्था में इस स्थान पर भी आये थे । मान्यता है कि इस घाट पर स्नान करने से दुखों व रोगों से मुक्ति मिलती है । त्रिवेणी संगम का वर्णन पौराणिक ग्रन्थों में भी मिलता है ।




बाणगंगा

बाणगंगा बड़ा ही मनोरम स्थान है । यहाँ समुद्र के किनारे शिवलिंग स्थापित किया गया है जो । समुद्र की लहरें आती हैं और शिवलिंग को जलमग्न कर वापस लौट जाती हैं । मानो प्रकृति द्वारा बार बार अनवरत शिवलिंग का अभिषेक किया जा रहा हो ।






भालका तीर्थ


सोमनाथ मुख्य मंदिर के बाद वेरावल में धार्मिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण स्थान है भालका तीर्थ । इस तीर्थस्थान के बारे में मान्यता है कि यहाँ पर विश्राम करते समय ही भगवान श्री कृष्ण के पैर के अंगूठे में जर नामक शिकारी ने गलती से तीर मारा था, जिसके पश्चात् उन्होनें पृथ्वी पर अपनी लीला समाप्त करते हुए निजधाम प्रस्थान किया।

श्री सोमनाथ ट्रस्ट द्वारा प्रबंधित इस स्थान को एक भव्य तीर्थ एवं पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजना पर कार्य चल रहा है । फिलहाल यहाँ श्रीकृष्ण का एक मंदिर निर्माणाधीन है ।

भालका तीर्थ के पास

निर्माणाधीन मंदिर के सामने




भालका तीर्थ हमारा अंतिम पड़ाव था । लगभग दो ढाई बजे चुके थे । सुबह नाश्ता थोड़ा हैवी हो गया था इसलिए लंच करने का मन नहीं कर रहा था, सो हम लोग सीधे अपने विश्रामालय पहुंचे । मेरा प्लान था कि थोड़ी देर विश्राम करने के पश्चात् समुद्र तट पर जाकर कुछ फोटो लूंगा और वहीँ कुछ भोजन भी किया जायेगा । परन्तु यात्रा के दौरान हर काम प्लान के मुताबिक नहीं होता । थकान तो थी ही, रात्रि में ट्रेन में नींद भी अच्छे से नहीं हो पाई थी इसलिए विश्रामालय पहुँचते ही सब गहरी नींद में सो गए और जब आँख खुली तो देखा कि अँधेरा हो चुका है । समुद्र तट पर मनोरंजन और फोटोग्राफी का मेरा अरमान दिल में ही रह गया ।

अब बस एक ही काम था जो आज सोमनाथ में किया जा सकता था, और वह था सोमनाथ मंदिर में प्रतिदिन शाम को होने वाला साउंड एंड लाइट शो देखना । जल्दी जल्दी तैयार होकर हम निर्धारित समय पर सोमनाथ मंदिर पहुँच गये । परन्तु वहां पहुंचकर पता चला कि साउंड एंड लाइट शो आज नहीं होगा । क्योंकि बारिश के सीजन में और बेमौसम बारिश के दिनों में भी शो का प्रदर्शन नहीं किया जाता । सम्भवतः यह शो, मंदिर के बाहर खुले आसमान के नीचे प्रदर्शित किया जाता है । थोड़ा अफ़सोस हुआ पर सोमनाथ मंदिर के पुनः दर्शन कर मन प्रसन्न हो गया । इसके बाद हमने कुछ खरीददारी की और सोमनाथ ट्रस्ट द्वारा संचालित भोजनालय में भोजन किया । यह एक सेल्फ सर्विस भोजनालय है जो मंदिर के समीप ही है । यहाँ भोजन बहुत ही सस्ता और सुस्वाद है ।


दोपहर में भरपूर नींद हो गई थी इसलिए अब आसानी से नींद नहीं आ रही थी । कुछ देर तक पूरी यात्रा के दौरान लिए गए चित्र देखता रहा फिर सो गया । सुबह उठकर आठ बजे तक सब लोग तैयार हो गए और सामान पैक भी कर लिया । आज हमारी यात्रा का अंतिम दिन था । हमारी ट्रैन सोमनाथ-जबलपुर एक्सप्रेस सुबह 9.30 पर थी । आठ बजते ही हमारे कमरे का दरवाजा किसी ने खटखटाया । दरवाजा खोला तो एक नवयुवक था जिसने सहमते सकुचाते हुए कहा कि ये दोनों रूम हमारे लिए बुक हैं । हम लोग सुबह 6 बजे से वेटिंग हाल में बैठे 8 बजने का इंतज़ार कर रहे हैं, अगर आप अभी एक रूम भी हमें दे दें तो हम अपना सामान वगैरह रखना शुरू करें । परन्तु हमने दोनों कमरे तत्काल छोड़ दिए क्योंकि हम तो आठ बजे निकलने के लिए पूरी तरह तैयार बैठे ही थे । कुछ देर बाद हमारी ट्रेन भी प्लेटफार्म पर लग गई ।

आज सोमनाथ में बहुत बारिश हो रही थी । स्टेशन की कैंटीन से लंच पैक करवाकर ट्रैन में बैठ गए । 9.30 बजे गाड़ी सोमनाथ स्टेशन से रवाना हो गई । अशोक पटैल जी का फोन आया कि शाम को गाड़ी 6 बजे अहमदाबाद पहुंचेगी और वो सपरिवार हमसे मिलने आएंगे अहमदाबाद स्टेशन पर । शाम को सही समय पर गाड़ी अहमदाबाद पहुँच गई । अशोक भाई के साथ साथ भाभी जी और बच्चों से भी मिलना जुलना हो गया जो किसी कारणवश उस दिन अहमदाबाद यात्रा वाले दिन नहीं हो सका था । अशोक भाई हम लोगों के लिए शाम का खाना भी लेकर आये । इतने दिनों से घर से बाहर निकले थे, आज बहुत दिनों बाद घर का बना खाना नसीब हुआ था जो बहुत ही स्वादिष्ट था । पटैल परिवार से हुई संक्षिप्त मुलाकात बहुत यादगार रही ।


बड़ौदा स्टेशन निकलने के कुछ देर बाद हम लोग सो गए । मेरी नींद सुबह जब खुली तब गाड़ी बैरागढ़ स्टेशन पर खड़ी थी, निर्धारित समय से पहले ही आ गई थी । भोपाल स्टेशन पर मैंने चाय पी जो इतनी घटिया थी कि ऐंसी चाय मैं मुफ्त में भी नहीं पिया करता । वक्त और गाड़ी दोनों का पहिया चलता रहा । विवेक(कन्हैया) शर्मा भाई और भाबीजी से वार्तालाप करते हुए समय का पता ही नहीं चला ।
इस ब्लॉग के माध्यम से मैं शर्मा परिवार को भी बहुत बहुत धन्यवाद कहना चाहूंगा जिनके साथ होने से हमारी पूरी यात्रा बहुत ही सुखद और आनंददायक रही ।


हमारी ट्रैन सही समय पर सोहागपुर पहुँच गई जहाँ हम उतर गए और शर्माजी सपरिवार सीधा उसी ट्रैन से आगे निकल गये ।

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Wednesday, October 5, 2016

बेट-द्वारका, नागेश्वर, गोपी तालाब, रुक्मणी मंदिर

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डेढ़ बजे हमारी टैक्सी आ गई । सब तैयार ही थे । हमारा पहला पड़ाव था नागेश्वर मंदिर ।


नागेश्वर मंदिर

नागेश्वर, भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है । यह द्वारका से 18 किलोमीटर दूर नगर के बाहरी क्षेत्र में स्थित है । मंदिर के सामने भगवान शिव की बहुत विशाल और अतिसुन्दर प्रतिमा है जो बहुत दूर से ही दिखाई देने लगती है । प्रतिमा के आसपास बहुत से कबूतर मंडरा रहे थे । सबसे पहले बच्चों ने कबूतरों को दाना खिलाया । इस दौरान मैंने कुछ फोटो लीं । नागेश्वर मंदिर वीरान जगह पर बना हुआ है । देखकर आश्चर्य हुआ कि मंदिर के आसपास कोई गाँव या बस्ती नहीं है । निकटतम शहर द्वारका ही है । द्वारकाधीश मंदिर में जितनी भीड़भाड़ थी, यहाँ उसका पांच प्रतिशत भी नहीं थी । यहाँ बस आम शिवमंदिरों जितनी भीड़ थी ।





जयश्री और अर्नव




नागेश्वर मंदिर के सामने सपना और अर्नव



मंदिर के भीतर कैमरा, मोबाइल आदि ले जाने की कोई मनाही नहीं है परंतु फोटोग्राफी/वीडियोग्राफी करना मना है । मंदिर में प्रवेश करने के बाद एक सभाग्रह पड़ता है जिसमे पूजा सामग्री, प्रसाद इत्यादि की दुकानें हैं । उसके बाद गर्भगृह जो थोड़ा निचले स्तर पर है जिसमें शिवलिंग है । मतलब दर्शन के लिए थोड़ा नीचे की ओर देखना पड़ता है । दर्शन बड़े इत्मीनान से हो गए । शिवलिंग पर चांदी का आवरण है और ऊपर एक नाग की आकृति है । एक निश्चित शुल्क देकर गर्भगृह में अभिषेक करने की व्यवस्था भी है । इस सुविधा का लाभ शर्माजी ने उठाया ।
बाहर निकलकर मैंने नारियल पानी पिया फिर हम सबने गोपी तालाब की ओर प्रस्थान किया ।




गोपी तालाब

 इसके बाद हम पहुंचे गोपी तालाब । गोपी तालाब नागेश्वर मंदिर से ज्यादा दूर नहीं है । माना जाता है कि श्रीकृष्ण के वियोग में गोपियों ने यहाँ अपने प्राण त्यागे थे । यह भी कहा जाता है कि इसी स्थान पर अर्जुन का गांडीव (धनुष) असफल हो गया था ।
गोपी तालाब की और उसके आसपास मिट्टी पीली है और बहुत ही मुलायम है, इसे गोपी चन्दन कहते हैं । गोपी चन्दन यहाँ स्थित दुकानों पर विक्रय हेतु भी उपलब्ध है । गोपी तालाब के किनारे एक कदम्ब का पेड़ है जिस पर श्रद्धालुओं द्वारा बांधे गये बहुत से मन्नत के धागे बंधे हुए थे । वहीँ किनारे स्थानीय लोगों द्वारा बनवाये हुए कुछ मंदिर हैं । कुछ दुकानें भी लगी हुई थीं ।  इसके बाद हम निकल पड़े बेट-द्वारका की ओर ।

गोपी तालाब



बेट-द्वारका


कहते हैं कि भगवान कृष्ण और उनके बाल सखा सुदामा की भेंट इस स्थान पर ही हुई थी इसलिए इसे भेंट द्वारका या बेट द्वारका कहा जाता है ।

द्वारका शहर से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है बेट द्वारका । बेट द्वारका समुद्र में एक टापू है जहाँ ओखा से जहाज द्वारा जाया जाता है । समुद्र 160 किलोमीटर तक फैला है उसके बाद पाकिस्तान का कराची शहर है ।

ओखा में ड्राइवर ने हमे वहां छोड़ा जहाँ से बेट द्वारका जाने हेतु फेरी/छोटा जहाज मिलता है । लगभग पांच मिनट पैदल चलकर हम जहाज तक पहुंचे । एक जहाज जो पूरा भर चूका था, जा रहा था और दूसरा अभी अभी लगा था जिसमे हम बैठे । जल्दी ही वो भी भर गया । लगभग सौ से डेढ़ सौ लोग भरे गये थे उसमे जो निश्चित ही क्षमता से अधिक थे । सागर में बहुत से जहाज खड़े हुए थे जो मुख्य रूप से मछली पकड़ने हेतु उपयोग में लाये जाते हैं । यहाँ ओखा में मुस्लिमों की आबादी बहुत है और अधिकतर जहाज उन्ही के हैं ।
जहाज से लगभग आधे घंटे लगते है बेट द्वारका पहुँचने में । समुद्र में जहाज पर यात्रा करना बहुत ही आनंददायक और रोमांचक अनुभव है ।  विशेषकर बच्चों को तो बहुत ही आनन्द आया । मंदिर खुलने का समय शाम को पांच बजे है और साढ़े चार बजे वहां पहुँच गए । जहाज से उतरने के बाद एक पुल से गुजरते हैं जहाँ से थोड़ा पैदल चलकर जाना होता है मंदिर तक । मंदिर के पट खुलने में समय था, इसलिए हमने एक दुकान पर चाय पी जो हमारी पूरी गुजरात यात्रा की सबसे बेहतरीन चाय थी । मंदिर मार्ग पर एक तिराहा पड़ा जहाँ कुछ ऑटो खड़े हुए थे । ऑटो चालक सभी निकलने वाले यात्रियों से कह रहे थे कि अभी हनुमान मंदिर चलिये क्योंकि द्वारकाधीश जी का मंदिर खुलने में अभी समय है । बेट द्वारका द्वीप पर हनुमान जी का मंदिर भी है और मुख्य मंदिर से सात किमी दूर चौरासी धुना नामक एक अति प्राचीन और ऐतिहासिक महत्व का स्थान भी है परन्तु हमे  समय बचाकर चलना था क्योंकि आज ही शाम को हमारी सोमनाथ की ट्रेन थी ।


























समुन्दर को निहारते शर्माजी




द्वारकाधीश मंदिर में बहुत भीड़ थी क्योंकि पांच बजे मंदिर खुलना था और दर्शनार्थी पहले से पहुँच चुके थे और पहुंचते जा रहे थे । वहाँ पहुंचकर हमने मोबाइल, कैमरा आदि काउंटर पर जमा किया और दर्शन हेतु लाइन में लग गए । लाइन में लगने से पहले मंदिर के एक युवा पंडित जी मेरे पास स्वयं आये और मुझे वीआईपी दर्शन कराने का प्रस्ताव दिया जिसे मैंने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया । मंदिर प्रांगण में दर्शन हेतु पंक्तिबद्ध श्रद्धालुओं को एक पंडित जी संबोधित कर रहे थे जो बेट द्वारका टापू और यहाँ के मंदिर के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का वर्णन करते जा रहे थे । उनके अनुसार "इस टापू की जनसँख्या लगभग 7000 है जिसमे से लगभग 5000 मुस्लिम आबादी है । यहाँ के मंदिर की मूर्ति स्वयं रुक्मणीजी के द्वारा बनाई गई है । इस स्थान पर ही श्रीकृष्ण से भेंट हेतु सुदामा आये थे आदि आदि ।"
मंदिर में प्रसाद नहीं चढ़ता सिर्फ तुलसी पत्र की माला चढ़ती है । मुख्य मंदिर से लगे हुए कुछ मंदिर और हैं जैसे रुक्मणी जी और सत्यभामा जी के मंदिर । सभी मंदिरों में एक के बाद एक जाना होता है । वहीँ एक मंदिर में पंडित जी ने सबको बैठ जाने को कहा और बताया कि यह वही स्थान है जहाँ भगवान द्वारकाधीश से भेंट करने हेतु सुदामा जी आये थे । पंडित जी ने कहा कि आज पूर्णिमा का पावन दिन  है और आप सभी बहुत भाग्यवान हैं जो आज के दिन इस पवित्र स्थल पर आये हैं । उन्होंने बताया कि द्वारका स्थित मंदिर में जितने भक्त आते हैं उसके पचास प्रतिशत लोग ही यहां भेंट-द्वारका पहुँच पाते हैं । भगवान् का निवास तो बेट द्वारका ही है, द्वारका तो उनका कार्यालय है । लोग कार्यालय में अर्जी लगाकर ही वापस लौट जाते हैं । यहाँ पर चावल चढ़ता है, जो लोग चावल लेकर आये थे उन्हें पंडितजी ने अर्पित करने को कहा । और सभी दर्शनार्थियों को उन्होंने थोड़े थोड़े चावल दिए और कहा कि इसे घर जाकर आप अपने भंडार में रखे हुए चावल में मिला लीजियेगा ।
वापिसी में फिर नौका में यात्रा करते हुए हम लगभग साढ़े छै बजे हम उस स्थान पर पहुँच गये जहाँ हमारी गाड़ी थी ।




रुक्मणी मंदिर


यह मंदिर द्वारका शहर के बाहरी क्षेत्र में है । हम जब यहाँ पहुंचे तो मंदिर परिसर तो खुला था पर भीतर मुख्य मंदिर के द्वार बंद थे । ड्राइवर ने बताया कि यह मंदिर हर थोड़ी थोड़ी देर में खोला और बंद किया जाता है । कुछ देर मंदिर परिसर में ही रहे, यहाँ सभी दर्शनार्थियों को मंदिर के कर्मचारियों द्वारा पानी पिलाया जाता है । परिसर में कुछ छोटे छोटे मंदिर और भी हैं । जब काफी लोग इकठ्ठा हो गए तो मंदिर का द्वार खोल दिया गया । यहाँ भी एक पंडित जी द्वारा दर्शनार्थियों को संबोधित किया गया । उन्होंने इस मंदिर के बारे में हमें यह बताया कि-
"एक बार श्रीकृष्ण से मिलने उनके गुरु ऋषि दुर्वासा आये । श्रीकृष्ण और उनकी पत्नी, रुक्मणी देवी स्वयं ऋषि दुर्वासा को लेने जंगल गए । उनका रथ स्वयं श्रीकृष्ण और रुक्मणी देवी खींच रहे थे । चलते चलते रुक्मणी जी को प्यास लग आई तो  भगवान कृष्ण ने रानी के लिए धरती धरती में लाठी मारकर गंगा का मीठा और पवित्र पानी प्राप्त किया । ऋषि दुर्वासा को यह देखकर क्रोध आ गया कि गुरु से पानी का पूछे बिना रुक्मणी जी ने कैसे पानी पी लिया। उन्होंने रुक्मणी जी को श्राप दे दिया । जिसके फलस्वरूप रुक्मणी जी बारह वर्ष कृष्ण से अलग रही। इसलिए यह मंदिर द्वारका से बाहर स्थित है ।"
पंडितजी ने बताया कि यहाँ जलसेवा हेतु पानी के टैंकर आते हैं और उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से अपने पितरों के नाम पर जलसेवा के लिए दान करने की अपील भी की ।
शाम 7:30 बजे हम लोग वापस स्टेशन आ गए । 8:30 पर ट्रेन थी । डिनर करने के लिए समय नहीं था इसलिए हमने खाना पैक करवा लिया ट्रैन में खाने के लिए । ट्रेन सही समय पर आ गई । भोजन करने के बाद सभी लोग सो गए । ट्रैन का  सोमनाथ पहुँचने का समय 5:25 है । अलार्म लगाने की कोई जरुरत नहीं थी क्योंकि सोमनाथ स्टेशन टर्मिनल है जहाँ रेलमार्ग समाप्त हो जाता है इसलिए सोते हुए आगे निकल जाने की भी कोई टेंशन नहीं थी ।


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Friday, September 23, 2016

द्वारिका

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द्वारिका नगरी वही है जिसे भगवान् श्रीकृष्ण ने लगभग 5000 वर्ष पूर्व मथुरा छोड़ने के बाद बसाया था । द्वारिका में शासन करते हुए ही भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में पांडवों को सहयोग किया और धर्म की विजय करवाई । हमारी ट्रेन सात बजे द्वारका स्टेशन पहुच गई । द्वारका में भी मैंने रिटायरिंग रूम बुक किया हुआ था । रिटायरिंग रूम में चेक-इन 8 बजे होता है । सबको वेटिंग रूम में बैठाकर मैं और शर्माजी पता करने गए कि अगर हमारे कमरे अभी खाली हैं तो क्या हमें समय से पूर्व मिल सकते हैं । कमरे तो खाली थे पर परिचारक ने हमे 8 बजे से पहले कमरे देने से मना कर दिया । मैंने महज कुछ मिनट पहले रूम लेने के लिए उसको अपनी पहचान बताना उचित नहीं समझा और हम वेटिंग रूम आ गए । कुछ देर बाद पता नही क्या सोचकर उसने स्वयं एक व्यक्ति को भेजा हमे बुलाने के लिए जिसने कहा कि आप अपने रूम में आ सकते हैं । साढ़े सात के पहले हमें अपने रूम मिल गए , इससे लाभ यह हुआ कि हम आज ही द्वारकाधीश मंदिर के दर्शन कर पाने की स्थिति में आ गए । स्नान इत्यादि करके हम सब 8:30 बजे तक तैयार होकर निकल पड़े द्वारकाधीश मंदिर ।



द्वारकाधीश मंदिर


जहाँ भगवान् श्री कृष्ण का निजी निवास था आज उसी स्थान पर द्वारकाधीश मंदिर है । आदि शंकराचार्य ने इस स्थान को भारत के चार धामों में से एक माना है । 
माना जाता है कि मूल मंदिर का निर्माण श्रीकृष्ण के प्रपौत्र ने करवाया था जिसका कालान्तर में जीर्णोद्धार किया जाता रहा । वर्तमान स्वरूप मंदिर को 16वीं शताब्दी में प्राप्त हुआ । 
द्वारकाधीश मंदिर में भी मोबाइल और कैमरा ले जाने की अनुमति नहीं है, यह बात मुझे प्रवेश द्वार पर पता चली । फिर मैंने सबके मोबाइल और कैमरा लेकर मंदिर परिसर में मोबाइल कैमरा आदि रखने हेतु मंदिर प्रशासन द्वारा संचालित  निशुल्क काउंटर पर पहुँचा । काउंटर पर कोई सीसीटीवी कैमरा नहीं लगा हुआ था । उन्होंने मोबाइल फोन और कैमरा लेकर एक पर्ची लिखकर मुझे दी जिसमे 1 और 4 लिखा हुआ था । मतलब एक कैमरा और चार मोबाइल ।
मंदिर के मुख्य द्वार के सामने काफी व्यस्त व्यावसायिक क्षेत्र है जहाँ प्रसाद, पूजन सामग्री, फूलमाला की दुकानें एवं होटल, धर्मशाला और भोजनालय आदि हैं ।
हमने मंदिर में प्रवेश किया तब आरती चल रही थी और लोग थमे हुए थे । भीड़भाड़ बहुत कम थी इसलिए हमें भी आरती में सम्मिलित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । गर्भगृह में भगवान द्वारकाधीश की चतुर्भुजी श्यामवर्णी प्रतिमा है । मेरे आगे एक बुजुर्ग व्यक्ति खड़े थे उन्होंने बताया कि आज सुबह आये थे तो बहुत ज्यादा भीड़ होने के कारण बिना दर्शन किये ही लौट गये थे इसलिए अब आये हैं । मतलब हमारा सुबह का इंतज़ार किये बिना आज ही भगवान द्वारकाधीश के दर्शन के लिये आना बिलकुल सही निर्णय था । श्रीकृष्ण को यहाँ रणछोड़ जी भी कहते हैं । रणछोर जी के मंदिर के अलावा इस परिसर में और भी बहुत से मंदिर हैं एवं शारदा मठ है । आदि गुरू शंकराचार्य ने देश के चार कोनों में चार मठ बनाए थे जिनमें एक शारदा मठ है ।
मनभावन रणछोड़ जी के मन भरकर दर्शन किये उसके बाद बाहर आकर मैंने मंदिर की कुछ फोटो लीं । उसके बाद हमने उस भोजनालय में खाना खाया जो ऑटो वाले ने रेकमेंड किया था । बढ़िया भोजनालय था, नाम याद नहीं आ रहा, मंदिर के मुख्य द्वार से गोमती घाट जाने वाले रास्ते पर ढलान वाली रोड पर है ।




खाना खाकर हम लोग स्टेशन पर अपने रिटायरिंग रूम आ गए । द्वारका रेलवे स्टेशन पर वेटिंग हाल और रिटायरिंग रूम(विश्रामालय) के नाम बहुत ही अनोखे अंदाज में लिखे हुए हैं जैसे रुक्मणी प्रतीक्षालय (महिला), नागेश्वर प्रतीक्षालय(पुरुष) और द्वारकेश विश्रामालय । हैं ना अनोखे ? 
द्वारकेश विश्रामालय पहुंचकर शर्मा फैमिली अपने शयनकक्ष में चली गई और कुछ देर प्लेटफार्म पर टहलने के बाद हम भी सो गए । 



द्वारकेश रिटायरिंग रूम 


सुबह उठकर दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होने के पश्चात् मैं और शर्माजी निकल पड़े भद्रकाली चौक जहाँ हमे बेट द्वारका और नागेश्वर के लिए कैब/टैक्सी बुक करनी थी । वैसे तो भद्रकाली चौक से द्वारका म्युनिसिपेलिटी की बस भी चलती है जो 5 घण्टे में नागेश्वर, गोपी तालाब, बेट द्वारका और रुक्मणी देवी मंदिर के दर्शन करवाती है । यह बस दो पालियों में सुबह 8 बजे और दोपहर 2 बजे से चलती है । बस में एक गाइड भी होता है और बस का किराया भी उचित है 100 रु प्रति व्यक्ति । परन्तु मैंने सुना था कि बस का हर स्थान पर एक निश्चित समयसीमा तक ही रुकने का नियम है और उतनी समयसीमा में ही आपको दर्शन, पूजन आदि सम्पन्न करके वापस बस में आना होता है । इसलिए हमने निजी टैक्सी बुक करने को प्राथमिकता दी । बच्चों और माताजी का साथ था इसलिए रिस्क नहीं लिया जा सकता था ।

सबसे पहले मैंने और शर्माजी ने भद्रकाली चौक पर ढोकले और पोहा का नाश्ता किया फिर एक टूर्स एंड ट्रेवल्स पर हमने एक वातानुकूलित टवेरा गाडी बुक की । तय हुआ की ठीक दो बजे ड्राइवर हमारे पास पहुँच जायेगा । यहाँ दो शिफ्टो में ही साइट सीइंग करवाई जाती है मंदिरों की टाइमिंग के कारण । टैक्सी बुक करके हम 9 बजे तक वापस आ गए । अभी हमारे पास पर्याप्त समय था इसलिए हमने एक ऑटोरिक्शा लिया और सीधा पहुंचे गोमती घाट ।


गोमती घाट द्वारकाधीश मंदिर के दक्षिणी द्वार पर है जहाँ गोमती नदी सागर में मिलती है । वहीँ पर सुदामा सेतु नाम से एक पुल बना जिसमे प्रवेश के लिए टिकट लेना पड़ता है । देखने से लग रहा था कि अभी नया निर्मित हुआ है । सुदामा सेतु सम्भवतः सागर दर्शन हेतु बनाया गया है । गोमती घाट पर समुद्र की लहरों में सभी को खासकर बच्चों को बहुत आनन्द आया । समुद्र की लहरों से हम में से अशिकांश का यह पहला आमना सामना था । अर्नव का हाथ पकड़कर मैंने उसको स्नान करवाया । उसका बाहर आने का कोई इरादा नहीं था परन्तु एक ऊँची लहर आयी जिससे उसके मुंह में समुद्र का खारा पानी आ गया तभी वह बाहर आया । 



गोमती घाट


सुदामा सेतु

बहुत से श्रद्धालु गोमती घाट में स्नान कर द्वारकाधीश मंदिर में प्रवेश करते हैं । घाट से 56 सीढियां चढ़कर सीधे द्वारकाधीश मंदिर में प्रवेश किया जा सकता है । एक दुकान में हमने प्रसाद लिया और वहीँ कैमरा, मोबाइल, पर्स और जूते चप्पल रखे । प्रसाद की दुकान वाला थोड़ा मजाकिया था, वो अपने आप को बार बार पुलिस का आदमी कह रहा था । मंदिर में प्रवेश के समय अर्नव मेरे साथ ही था । एक माला वाले से 10 रूपये में दो मालाएं ली, एक तुलसी के पत्तों की और एक फूलों की । अर्नव ने अपनी जेब से सात रूपये चिल्लर निकाल कर माला वाले को दे दिए । मुझे और माला वाले दोनों को हंसी आ गई । फिर मैंने वो चिल्लर माला वाले से वापस लेकर उसको दस का नोट दिया । तब तक बाकी साथी काफी आगे बढ़ चुके थे । मैं और शर्माजी एक साथ मंदिर में दाखिल हुए । लेडीज पहले ही अंदर जा चुकी थीं और हमारी प्रतीक्षा कर रही थीं, उनके साथ एक पंडित जी थाल लिए खड़े और उनको कुछ समझा रहे थे । यह देखकर  मैं और शर्माजी भलीभांति समझ चुके थे कि माजरा क्या है । फिर हमने उनको वहां से बुलाया और आगे बढ़ गए । पंडितजी ने हमे रोकने का पूरा  प्रयास किया पर हम नहीं रुके । मैं अनावश्यक रूप से पण्डे पुजारियों के चक्कर में नहीं पड़ता । वहीँ पड़ता हूँ जहां नितांत आवश्यक हो ।

मंदिर में इतनी ज्यादा भीड़ थी कि शब्दों में बयाँ करना मुश्किल है । दो घण्टे से पहले दर्शन मिलने वाले नहीं थे । हम कल शाम को बहुत अच्छे से दर्शन कर ही चुके थे इसलिए आज दूर से ही करबद्ध प्रार्थना कर ली । मंदिर में हमे वो 75 वर्षीय वृद्ध पुरुष फिर मिल गए जो ट्रैन में हमारे साथ थे । बहुत ही आश्चर्य और प्रसन्नता हुई । वे भी हमसे मिलकर गदगद हो गए । आज उनके साथ कुछ और लोग भी थे । वो अपने साथियों को गुजराती भाषा में हम लोगों के विषय में बताने लगे । इतनी ज्यादा भीड़ में उनका मिलना किसी आश्चर्य से कम नहीं था । थोड़ी देर मंदिर के प्रांगड़ में बैठे, असीम मानसिक शांति मिली । 

फिर बाहर निकलकर अपना मोबाइल, कैमरा आदि लिया । मेरे मोबाइल में दो मिस्ड कॉल थे । गुजरात का नम्बर था, मैंने कॉल किया तो उसने कहा मैं ड्राइवर हूँ, साइट सीइंग के लिए चलना है ना, मैं डेढ़ बजे पहुँच जाऊंगा, आप लोग तैयार रहियेगा । फिर हमने कुछ खरीददारी की, फिर उसी होटल में स्वल्पाहार किया जहाँ कल डिनर किया था । वैसे तो द्वारकाधीश मंदिर के आसपास 2-3 किलोमीटर के दायरे में बहुत से मंदिर हैं परंतु समयाभाव के कारण हम नही गये और वापस अपने विश्रामालय आ गए ।


द्वारकाधीश मंदिर, गोमती घाट वाले मार्ग से








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Wednesday, September 21, 2016

सोमनाथ-द्वारिका-अहमदाबाद यात्रा

भगवान शिव के प्रथम ज्योतिर्लिंग विश्वप्रसिद्ध सोमनाथ जी के दर्शन की अभिलाषा मन में तब से थी जबसे जबलपुर-राजकोट एक्सप्रेस को सोमनाथ तक बढ़ाया गया था । सोमनाथ जाने का तय हुआ तो एक मित्र ने कहा कि वहीँ से द्वारका भी हो आना । चार धामों में से एक द्वारका या द्वारिका गुजरात में स्थित भारत का अत्यंत मत्वपूर्ण तीर्थ है । फिर द्वारका और सोमनाथ की योजना बन ही रही थी गुजरात के अक्षरधाम मंदिर के दर्शन का विचार भी आया और इस प्रकार अहमदाबाद भी हमारे कार्यक्रम का हिस्सा बन गया ।

सौभाग्य से श्री विवेक शर्मा जी और उनका परिवार भी इस यात्रा में हमारे साथ रहा । शर्मा परिवार के साथ हमारी यह दूसरी धार्मिक यात्रा है । इसके पहले सन् 2011 में हम लोग सब श्री वैष्णो देवी जी की यात्रा पर गये थे । विवेक शर्मा जी मेरे अभिन्न मित्र हैं और हम दोनों के परिवारों के आपस में बहुत घनिष्ट सम्बन्ध हैं इसलिए उनके साथ कोई भी आउटिंग या यात्रा बहुत ही सुखद होती है । कारवाँ शुरू हुआ जबलपुर से, जहाँ से शर्माजी का परिवार चढ़ा जबलपुर-सोमनाथ एक्सप्रेस में और लगभग तीन बजे दोपहर में हम लोग जुड़ गए ।
भोपाल निकलने के बाद हम सबने खाना खाया और उज्जैन से पहले सभी लोग सो गए । हमारा पहला पड़ाव था अहमदाबाद ।

                    अहमदाबाद

सुबह ट्रैन ठीक आठ बजे अहमदाबाद पहुँच गई । इस बार मैंने होटल की बजाय रेलवे के विश्रामालय  (रिटायरिंग रूम) बुक किये थे । रिटायरिंग रूम में सुबह 8 बजे या शाम को 20 बजे चेक इन किया जा सकता है । रिटायरिंग रूम 12, 24,36 या अधिकतम 48 घण्टों के लिए आपकी यात्रा के प्रारम्भिक स्टेशन या गंतव्य स्टेशन के लिए ऑनलाइन बुक किया जा सकता है ।
अहमदाबाद का रेलवे रिटायरिंग रूम स्टेशन के ऊपर प्रथम मंजिल पर था । हमारे दोनों कमरे काफी बड़े और साफ़ सुथरे थे ।
अहमदाबाद में मेरे एक बहुत ही खास मित्र भी सपरिवार निवास करते हैं श्री अशोक पटेल जी  । अशोक जी स्वास्थ्य विभाग में टेक्नीशियन पद पर हैं और विगत लगभग एक वर्ष से अहमदाबाद में हैं । वे मेरे बचपन के करीबी मित्र हैं और स्कूल में भी मेरे साथ पढ़े हैं । हमारे अहमदाबाद आगमन की जानकारी उनको कई महीनों पहले से थी । अशोक जी हमारे आने की सूचना से काफी उत्साहित थे ।
पहले मेरी योजना थी दिन भर अहमदाबाद घूमकर शाम को गांधीनगर स्थित अक्षरधाम मंदिर जाने की परन्तु अहमदाबाद की गर्मी ने हमें अपनी योजना बदलने को विवश कर दिया । अब सिर्फ अक्षरधाम मंदिर और कांकरिया झील ही हमारे कार्यक्रम का हिस्सा थे ।
इतनी गर्मी की मुझे बिलकुल उम्मीद नहीं थी इसलिए सितम्बर का महीना चुना था क्योंकि सितम्बर के मध्य तक सामान्यतः बरसात का मौसम भी समाप्त हो जाता है, गर्मी भी नहीं होती है और ठंडी का आगमन भी नहीं होता है ।

अक्षरधाम

"जहाँ कला चिरयुवा है, संस्कृति असीमित है और मूल्य कालातीत हैं।"
अक्षरधाम मंदिर.
चित्र- गूगल से साभार


लगभग डेढ़ बजे हम खाना खाकर निकल गए अक्षरधाम मंदिर । अशोक भाई ने एक ओला कैब और एक उबेर कैब बुक कर दी थीं । लगभग एक घण्टे में हम गांधीनगर स्थित अक्षरधाम मंदिर पहुँच गये । मंदिर में कैमरा, मोबाइल, बैग आदि ले जाना मना है इन सबको जमा करने हेतु निशुल्क काउंटर बने हुए हैं । मंदिर के बाहर गुजराती परिधानों की दुकानें हैं और सामने रोड के दूसरी तरफ खाने पीने की बहुत सी छोटी बड़ी दुकानें हैं ।
हमने अपने मोबाइल, कैमरा वगैरह काउंटर पर जमा करके मंदिर में प्रवेश किया । प्रवेश द्वार पर सुरक्षा जांच कर्मचारी एक प्लास्टिक की ट्रे देते हैं जिसमे अपने पर्स, बेल्ट, घडी आदि रखना होता है, फिर थोड़ा आगे दुसरे सुरक्षा जांच कर्मचारी उन वस्तुओं की जाँच करते हैं फिर मंदिर परिसर में प्रवेश मिलता है ।
गांधीनगर का अक्षरधाम मंदिर वही है जो सन् 2002 में आतंकी हमले के बाद लाइमलाइट में आया था । इसका निर्माण स्वमीनारायण संप्रदाय द्वारा सन् 1992 में कराया गया था । भगवान् स्वामींनारायण को सपर्पित यह मंदिर 32 मीटर ऊंचा, 73 मीटर लंबा और 39 मीटर चौड़ा है। इसका निर्माण 6000 गुलाबी बलुआ पत्थरों से हुआ है ।
मंदिर परिसर में कैमरा तो निषेध है पर अगर आप यादगार के लिए अपनी फोटो खिंचवाना चाहें तो फोटोग्राफर उपलब्ध हैं जो 100 रु प्रति फोटो की दर से फोटो खींचकर देते हैं । परिसर में गार्डन और फव्वारे बहुत ही आकर्षक हैं । बच्चों के खेलकूद एवं मनोरंजन के लिए झूले आदि हैं । मुख्य भवन में भगवान् स्वमीनारायन की स्वर्णजड़ित मूर्ती के अलावा उनके शिष्यों की भी मूर्तियां हैं जिन्होंने पंथ को सम्हाला । ऊपर प्रथम तल पर स्वामीनारायण जी के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएं चित्र रूप में हैं । उसके बाद एक संग्रहालय है जिसमे बहुत सी ऐंसी वस्तुएं हैं जिनका उपयोग स्वामीनारायन जी ने स्वयं किया था । पांच प्रदर्शनी हाल बने हुए हैं जिनमे दो-ढाई घंटे की स्वामीनारायण जी से जुडी प्रदर्शनी है, शायद चलचित्र के रूप में । मेरी माताजी की कोई इच्छा नहीं थी इसलिये हम वहां नहीं गए । अभी लगभग 4 बजा था और मंदिर परिसर में शाम को दिखाये जाने वाले बहुचर्चित लेज़र लाइट शो जिसे वाटर शो भी कहते हैं में 3 घंटे का समय बाकी था । इतनी देर तक इंतज़ार करने के पक्ष में कोई भी नहीं था इसलिए हम मंदिर से बाहर आ गए । कैमरा नहीं होने के कारण चित्र नहीं ले सके ।
"कला प्रदर्शनियों, उत्कृष्ट शिल्प कला एवं अध्यात्म का अनूठा संगम है अक्षरधाम मंदिर"
अक्षरधाम मंदिर के सामने

सान्वी और अर्नव


अशोक पटैल जी, अक्षरधाम मंदिर के सामने

जबलपुर सोमनाथ एक्सप्रेस में


बाहर स्थित दुकानों पर हम लोगों ने स्वल्पाहार किया । उसके बाद एक वैन बुक करके वापस अहमदाबाद का रुख किया । पता नहीं गर्मी का असर था या बाहर के खाना का दुष्प्रभाव जिससे मुझे सरदर्द होना शुरू हो गया । उस दिन अहमदाबाद में गणेश विसर्जन था जिससे कई बार हमारी गाडी ट्रैफिक जाम में भी फंसी । कांकरिया लेक पर बच्चों के मनोरंजन के साधनों का खजाना है । कई प्रकार के झूले, टॉय ट्रेन, बलून राइड और पता नहीं क्या क्या । लेकिन वहां पहुँचते पहुँचते मेरा सरदर्द असहनीय हो गया । वैसे भी सब लोग थके हुए तो थे ही, थोड़ी देर तक कांकरिया झील पर रुके फिर ऑटो से अपने ठिकाने पर चले गए । पूरे दिन अशोक भाई हमारे साथ रहे । शाम को उन्होंने मेरे लिए दवा की व्यवस्था की । मेरी तबियत से पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही उन्होंने हमारा साथ छोड़ा । उनके आतिथि सत्कार का मैं सदैव कृतज्ञ रहूँगा ।
रात में कब नींद लगी पता ही नहीं चला । सुबह उठे, स्नान इत्यादि करके नाश्ता करते करते 8 बज गए । चेकआउट का समय भी आठ बजे ही था । चेकआउट करके हम प्लेटफार्म नम्बर 1 पर पहुँच गए जहाँ से 8.55 पर हमारी द्वारिका जाने वाली ट्रेन थी जो समय पर आ गई । अहमदाबाद से द्वारिका दिन भर की यात्रा थी । अगर आप ऐंसे रेलमार्ग पर यात्रा कर रहे हैं जो आपके लिए नया हो और आप अगर सो नहीं रहे हैं तो ट्रैंन के स्टॉपेज वाले हर स्टेशन को देखते हैं या देखने का प्रयास करते हैं कि कौनसा स्टेशन है, यह मानवीय स्वभाव है । हम भी यही करते हुए आगे बढ़ते रहे । ट्रैन में मेरा दही या छाछ पीने का बहुत मन कर रहा था तभी अचानक एक छाछ बेंचने वाला प्रकट हो गया । मेरी तो जैसे मन मांगी मुराद पूरी हो गई । सफर में हमारे एक हमसफ़र थे बड़ौदा निवासी एक 75 वर्षीय दादाजी । उन्होंने बताया कि वे कई साल से लगातार नियमित रूप से हर पूर्णिमा के दिन भगवान द्वारकाधीश के दर्शन करने जाया करते हैं । हंसमुख, जिंदादिल और इस उम्र में भी अकेले सफर करने में पूर्णतः सक्षम । वे अपना ज्ञान और अनुभव हमसे साँझा करते रहे ।
जैसी की उम्मीद थी, हमारी ट्रेन निर्धारित समय पर ठीक सात बजे द्वारिका स्टेशन पहुँच गई ।

Monday, September 12, 2016

ब्रज भूमि : कन्हैया की अद्भुत लीलाओं की मनोहारी स्मृतियाँ, भाग-3

इस यात्रा वृत्तांत के पिछले भाग पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएँ-
भाग 1
भाग 2


नन्दगाँव से हम बिना कहीं रुके सीधा मथुरा पहुंचे । होटल पहुंचकर हम सबने एक भरपूर नींद ली । खाना तो छोले भटूरों के रूप में हो ही चुका था गोवर्धन में । योजना तो पहले यह थी कि आज शेष बचे दिन में मथुरा शहर के सारे बचे हुए प्रमुख दर्शनीय स्थल हो जायेंगे (जन्मभूमि मंदिर को छोड़कर) पर अफ़सोस, नींद खुली लगभग साढ़े पांच बजे और तैयार होते होते छै सवा छै बज गए । तब हमने अपने कार्यक्रम को द्वारकाधीश मंदिर और विश्राम घाट तक ही सीमित किया ।

द्वारकाधीश मंदिर

लगभग पौने सात बजे हम पहुंच द्वारकाधीश मन्दिर पहुँच गए । यह मंदिर सेठ गोकुलदास जी जो कि ग्वालियर रियासत में खजांची थे ने सन् 1814 में बनवाया था । आजकल इसका प्रबन्ध बल्लभाचार्य सम्प्रदाय देखता है । श्रीकृष्ण को ही द्वारका का राजा कहा जाता है, उन्ही के नाम पर इस मंदिर का यह नाम पड़ा । इस मंदिर के भीतर बेहतरीन चित्रकला और नक्काशी देखने को मिलती है । यहां राधा कृष्ण की प्रतिमा के अलावा और भी कुछ देवी देवताओं की प्रतिमाएं हैं ।
द्वारकाधीश मंदिर विशेष रूप से अपने हिंडोलों (झूलों) के त्यौहार के लिए प्रसिद्ध है जो श्रावण मास के अंत में मनाया जाता है ।

द्वारकाधीश मन्दिर के परिसर में






विश्राम घाट

द्वारकाधीश मंदिर विश्राम घाट के बिलकुल समीप ही है । कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने कंस के वध के पश्चात् यमुना नदी के इस तट पर विश्राम किया था इसलिए इसका नाम विश्राम घाट पड़ा । 
हम लोग जब विश्राम घाट पहुंचे तो यमुना जी की सांयकालीन आरती प्रारम्भ होने ही वाली थी । संयोग और सौभाग्य से हम लोगों को भी आरती में सम्मिलित होने का अवसर मिल गया । आरती के बाद हमने यमुना नदी में नौका-विहार किया ।
घाट से बाहर आकर हमने बच्चों के लिए खिलौने, कपड़े आदि खरीदे । मैंने अपने लिए एक टीशर्ट ली जिसमे आगे पीछे कई जगह "राधे" अंकित किया हुआ था, अगले दिन के लिए कुछ विशेष और अलग पहनने के उद्देश्य से 😂
फिर एक सायकल रिक्शा की सवारी का आनन्द उठाते हुए हमलोग सीधा होटल पहुंचे और खाना खाया । रूम पर पहुंचकर सबसे पहले टीवी ऑन किया क्योंकि उस दिन वर्ल्ड टी20 कप में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण मैच खेला जा रहा था । एक पारी हो चुकी थी, सिर्फ दूसरी पारी देखने को मिली जिसमें विराट कोहली ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए एक लगभग हारा हुआ मैच जिताया था ।


28-03-2016

आज मथुरा में हमारा तीसरा और अंतिम दिन था जिसमे हमे वृन्दावन के ख़ास ख़ास स्थलों के दर्शन करना था । सुबह हम जल्दी ही निकल पड़े । सबसे पहले ड्राईवर ने एक ऐंसे स्थान पर गाड़ी रोकी जहाँ 4-5 महत्वपूर्ण मंदिर पास पास हैं । ड्राईवर की सलाह के अनुसार हमने यहाँ एक गाइड (पंडित) किया वो सबसे पहले हमे लेकर गया श्री गोविन्ददेव मंदिर ।

गोविन्द देव मंदिर

इस मंदिर का निर्माण सन् 1590 ई. में आमेर के राजा भगवान् दास के पुत्र राजा मानसिंह ने करवाया था । बताया जाता कि इस मंदिर  के निर्माण में लगभग दस वर्ष का समय लगा था । यह मंदिर सात मंजिला था जिसे तुड़वा कर छोटा कर दिया गया था मुगल शासक औरंगजेब द्वारा ।


इसके बाद गाइड हमे एक अन्य मंदिर ले गया जिसका नाम मुझे याद नहीं आ रहा । मंदिर के बाहर ही उसने कहा कि माला लेकर मंदिर में जाइये हमने माला खरीदी और मंदिर में प्रवेश किया । मंदिर के पुजारी जी ने बड़े ही प्रेमपूर्वक हमें भगवान की प्रतिमा के समक्ष बिठाया और अपना खेल शुरू किया, धार्मिक प्रलोभन और धार्मिक ब्लैकमेलिंग का खेल । गाइड के कहने पर खरीदी गई माला का उद्देश्य अब समझ में आ गया था, उसी माला को हाथ में लेकर हमें संकल्प करने और दान करने को कहा गया । अनिष्ट होने का भय भी दिखाया गया । हमने श्रद्धानुसार जो दान दक्षिणा दी उससे पुजारी जी संतुष्ट नहीं हुए । आशानुरूप धन ना मिलने की बात पुजारी ने गाइड को बताई तो गाइड हमसे नाराज हो गया । हालाँकि गाइड की फीस हमने पहले ही तय की हुई थी जो हमने बाद में दी भी । पर पुजारी से मिलने वाले उम्मीद से कम कमीशन की जानकारी मिलते ही वह तिलमिला गया और उसने अपना असली रंग दिखा दिया । फिर उसने कहा कि यहाँ के सब मंदिर हो गए हैं अब आप अपनी गाड़ी में बैठिये और वृन्दावन के अन्य मंदिर देखिये । हालाँकि मुझे पता था कि कुछ रह गया है, परन्तु समय भी कम था और अब मैं स्वयं भी उस लोभी पंडित (गाइड) से पीछा छुड़ाना चाह रहा था ।


कांच मंदिर

उसके बाद हम पहुंचे वृन्दावन के एक अन्य मंदिर "कांच का मंदिर" । मंदिर के बाह्य भाग में कांच की कोई कारीगरी मुझे दिखी नहीं बल्कि मंदिर की भीतरी छत और दीवाल में अवश्य कांच की बहुत सी कलाकृतियां थीं ।
इस मंदिर का मुख्य आकर्षण यहाँ पर गुफानुमा बनाई गई गैलरी में विद्युत् से संचालित झांकी थी जिसमें ना सिर्फ बच्चों का बल्कि हम सभी का मन प्रसन्न हो गया ।


निधिवन का नाम मैंने बहुत सुना था । निधिवन में राधा कृष्ण रास रचाते थे और कहते हैं कि आज भी रात में यहाँ राधा कृष्ण रास रचाते हैं । जब मैंने ड्राइवर से निधिवन चलने को कहा तो उसने कहा कि निधिवन तो वहीँ पड़ता है जहाँ गाइड आपको लेकर गया था, क्या उसने आपको नहीं बताया ? मैंने कोई जवाब नहीं दिया बस मन मसोस कर रह गया और एक बार फिर गाइड के प्रति मन क्रोध से भर गया । आज हमारे पास समय भी ज्यादा नहीं था इसलिए वापस निधिवन जाने का कोई इरादा नहीं किया ।


बांके बिहारी मंदिर

इसके बाद हम पहुंचे वृन्दावन के सबसे प्रमुख मंदिरों में से एक श्री बांके बिहारी मंदिर । इसका निर्माण सन् 1964 में स्वामी हरिदास जी द्वारा करवाया गया था ।
जहाँ ड्राइवर ने हमे छोड़ा वहां से मंदिर तक एक किलोमीटर से भी ज्यादा यात्रा करनी पड़ी । मंदिर तक पूरा मार्ग और मंदिर के समीप भी अत्यधिक व्यस्त और भीड़भाड़ भरा क्षेत्र है । श्री बांके बिहारी जी के मंदिर में कपडे का पर्दा लगा रहता है जो हर कुछ मिनट में खोला व् बंद किया जाता है ।
वापस हम लोग पुनः जब वहां पहुंचे जहां ड्राइवर ने छोड़ा था तो ड्राइवर गाड़ी सहित नदारद था । उसको फोन लगाया तो उसका मोबाइल बंद बता रहा था । बहुत देर तक उसका मोबाइल बंद ही बताता रहा । वैसे भी अब तक सब लोग थक चुके थे और ड्राइवर की इस हरकत से सबका गुस्सा सातवें आसमान पर था । अच्छा हुआ मेरे पास होटल के रिसेप्शन का नम्बर था , उनको फोन लगाया तो ड्राइवर तुरंत हमारे सामने हाज़िर हो गया । दरअसल उसके पास दो मोबाइल थे जिनमें से एक मोबाइल बंद हो गया था और उसी का नम्बर हमारे पास था । वहाँ थोड़ी दूर पर पार्किंग स्थल था इसलिए वो गाड़ी सहित वही पहुच गया था किसी पुलिस वाले के आदेश से । ड्राइवर थोड़ा सीधा सादा था इसलिए उसको ज्यादा खरी खोटी सुनाने का मेरा मन नहीं किया, यह काम होटल के मैनेजर ने कर दिया था बाद में हमारे सामने । हालाँकि मैं ऐँसा बिलकुल नहीं चाहता था ।


इस्कोन मंदिर

इसके बाद हमारा अगला पड़ाव था इस्कोन टेम्पल । इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर जांच प्रक्रिया से गुजरना होता है । यहां विदेशी महिला पुरुष राधा कृष्ण की भक्ति में डूबे, नृत्य करते, भजन कीर्तन करते हुए देखे जा सकते हैं । इसे अंग्रेजों का मंदिर भी कहा जाता है ।




प्रेम-मंदिर

इसके बाद ड्राइवर हमे लेकर गया प्रेम मंदिर ।जब हम पहुंचे उसके पांच सात मिनट पहले ही ठीक बारह बजे मंदिर का प्रवेश द्वार बंद हुआ था । हालाँकि मंदिर परिसर में काफी लोग विचरण कर रहे थे पर वे सभी लोग 12 बजे से पहले द्वार बंद होने के पूर्व प्रवेश कर चुके थे । अगर मंदिर के टाइमिंग का मुझे पहले से पता होता तो हम इस्कोन मंदिर से पहले प्रेम मंदिर ही जाते क्योंकि इस मंदिर के बारे में मैने काफी कुछ पहले से सुना हुआ था ।
बाहर से देखने पर ही समझ में आ गया था कि निश्चित ही यह मथुरा वृन्दावन का सबसे भव्य मंदिर है । बहुत अफ़सोस हुआ ।

प्रेम मंदिर का शिलान्यास कृपालु जी महाराज द्वारा सन् 2001 में किया गया था जो लगभग ग्यारह वर्ष में तैयार हुआ । लागभग 100 करोड़ रूपये की धनराशि से निर्मित यह मंदिर 54 एकड़ भूमि पर फैला हुआ है । उच्चस्तरीय भारतीय शिल्पकला की एक अनूठी, बेजोड़ मिसाल है प्रेम मंदिर !
प्रवेश द्वार पर सुरक्षा कर्मचारी पूरी मुस्तैदी से डटे हुए थे । मैंने सोचा इनसे निवेदन करके मंदिर के प्रांगड़ में जाने की जुगाड़ लगाई जाए । वहीँ एक दादा और उनका पोता भी मंदिर में जाने के लिए उनसे बार बार विनती कर रहे थे पर वो मानने को बिलकुल तैयार नहीं थे, बल्कि पोता जब जबरन अंदर जाने लगा तो प्रहरियों ने उसको लगभग धकेलते हुए बाहर कर दिया । यह देखकर मैंने भी हार मान ली और बाहर से ही प्रेममन्दिर की कुछ फोटो खींचकर चुपचाप अपनी गाड़ी में बैठ गया । मंदिर खुलने तक प्रतीक्षा नहीं की जा सकती थी क्योंकि आज ही हमारी वापसी की ट्रेन थी लगभग चार बजे ।
फिर हमने सीधे मथुरा का रुख किया । रास्ते में प्रसिद्ध ब्रजवासी स्वीट से बहुत सारे पेड़े खरीदे, क्योंकि अगर आप मथुरा की यात्रा करके आ रहे हैं और अपने स्वजनों के लिए मथुरा के पेड़े ना लाये तो बहुत बड़ा अपराध माना जाता है । 😁
लगभग डेढ़ बजे हम अपने होटल पहुँच गये । तैयारी तो सुबह ही पूरी कर ली थी । होटल के रेस्टॉरेंट में अंतिम बार भोजन किया और रेलवे स्टेशन की ओर प्रस्थान किया । ट्रैन आने तक वेटिंग रूम में बच्चों ने खूब धमा चौंकड़ी मचाई जबकि बड़े लोग सब थके हारे हुए बैठे रहे । पता नहीं बच्चों में इतनी ऊर्जा कहाँ से आ जाती है ।
साढ़े चार बजे हमारी ट्रेन आई और हम मथुरा की मीठी यादें दिल में संजोये वापस अपने घर की ओर चल पड़े । यूँ तो कृष्ण जन्म और उनकी लीलाओं से सम्बंधित कई कहानियां मैंने सुनी हैं परंतु ब्रज क्षेत्र की पावन भूमि पर यात्रा करते हुए श्रीकृष्ण की कथाओं के स्मरण ने मुझे एक ऐँसा अनोखा अहसास दिया जो सदैव हृदय में रहेगा ।