Tuesday, March 29, 2016

ब्रज भूमि : कन्हैया की अद्भुत लीलाओं की मनोहारी स्मृतियां



बहुत दिनों से सपरिवार मथुरा वृन्दावन जाने की सोच रहा था, विशेष रूप से माँ के साथ । इस बार होली पर जाने की प्रबल इच्छा हुई । पर वहां होली पर कुछ ज्यादा ही भीड़भाड़ होती है इसलिए होली के ठीक बाद में जाने की योजना बनाई ।

25 मार्च को हम लोग मथुरा के लिए निकले । जबलपुर-नई  दिल्ली ट्रेन में रिजर्वेशन था । हम लोग 26 तारीख को सुबह लगभग 9 बजे मथुरा पहुँच गए ।

पिपरिया स्टेशन पर गाड़ी का इंतज़ार करते हुए अर्नव ने मुझे बिना बताये फ़ोटो क्लिक की 👍😀


मथुरा जंक्शन स्टेशन उतरकर सीधे अपनी होटल पहुंचे जहाँ पहले से रूम बुक था । एडवांस में रूम बुक करना बहुत ही फायदे का सौदा साबित हुआ क्योंकि ऑनलाइन बुकिंग मे ना सिर्फ अच्छा खासा डिस्काउंट मिल गया बल्कि वहां पहुंचकर भटकना भी नही पड़ा । वरना अधिकांश जगहों पर मैंने देखा है कि ऑटो रिक्शा वाले अपनी पसन्द की होटलों में ही रूम दिखाते हैं जहां उनका कमीशन फिक्स रहता है और इसी वजह से रूम का चार्ज मनमाफिक लिया जाता है । समय नष्ट होता है सो अलग ।

खैर, पहुचकर अगला जरुरी काम था वहां घूमने के लिए वाहन बुक करना । कुछेक जगह बात करने के बाद मथुरा, वृन्दावन, गोकुल, बरसाना, नंदगांव, गोवर्धन की यात्रा के लिए अपने होटल की ही गाड़ी एसी इनोवा बुक की ।  हम लोगों का लौटने का रिजर्वेशन 28 मार्च का था इसलिए कोई जल्दी नहीं थी । चूँकि रात में ट्रेन में अच्छे से सो नहीं पाये थे इसलिए हम सबने लंच के बाद एक भरपूर नींद ली ।

गोकुल

लगभग ढाई बजे हमने अपनी यात्रा पारंभ की । हमारा पहला पड़ाव था गोकुल । गोकुल मथुरा से 16 km यमुना के दूसरी तरफ बसा है । गोकुल वही है जहाँ श्रीकृष्ण के जन्म के पश्चात् उन्हें उनके पिता वासुदेव जी द्वारा लाया गया था । जब हमारी गाड़ी यमुनाजी के पुल से निकल रही थी तो अकस्मात मेरी माँ को वह बात स्मरण हो आई ।



नन्द महल

गोकुल पहुचते ही हमारा स्वागत एक पंडितनुमा गाइड ने किया । गोकुल की संकरी गलियो से गुजरते हुए गाइड हमे कृष्ण की लीलाओं के बारे में बताता रहा । और साथ ही नंदमहल में विराजमान श्रीकृष्ण को भोग लगाने के महत्त्व का भी वर्णन करता रहा । बाल भोग से लेकर छप्पन भोग तक कुछ 5-6 केटेगरी थीं । जिसमे लगभग सात-आठ सौ रुपये से लेकर 51000 तक का दान देना होता है । मैंने पहले ही यह बात सुन रखी थी इसलिए संकल्प लेने से बच गया ।
मंदिर के पुजारी और गाइड की जबरदस्त सेटिंग रहती है और पुजारी जी आपको फंसाने का भरसक प्रयास करते हैं । धार्मिक भावनाओं में बहकर संकल्प लिया और फंसे । गौ सेवा के नाम से लिया जाना वाले उस दान का कितना हिस्सा गौसेवा में लगाया जाता है यह तो भगवान श्रीकृष्ण ही जानें । माना कि यह उनका प्रोफेसन है पर कम दक्षिणा देने वालों से रूखा बर्ताव और इमोशनली/धार्मिक ब्लैकमेल करना  मुझे तो बड़ा ही नागवार गुजरा ।
गोकुल में श्री कृष्ण का बचपन बीता था । नन्दमहल में हमने वह स्थान भी देखा जहां भगवान ने पूतना को मोक्ष दिया था । वह स्थान भी देखा जहां कन्हैया ने घुटनों के बल चलना सीखा । ग्वालों के संग खेलना, माखन की चोरी आदि कई लीलाएं उन्होंने गोकुल में की ।
गोकुल की गलियों में नटखट कान्हा की यादों से मन प्रफुल्लित हो गया ।
गोकुल में बलराम जी का मंदिर भी दर्शनीय है ।
नंदमहल में वह स्थान जहाँ भगवान ने पूतना वध किया था । वहां बैठा बालक मुझे फ़ोटो लेने से मना करता हुआ । 😂

रमन-रेती

गोकुल के बाद हमारा अगला पड़ाव था रमन रेती । मैंने पहले कभी इस जगह का नाम नहीं सुना था पर वहां पहुच कर देखा कि वहां भी श्रद्धालुओं का ताँता लगा हुआ था । रमन रेती आश्रम में यमुना जी की पवित्र और मुलायम रेती है । श्रद्धालु उसमे ग्रुप बनाकर बैठे हुए थे ।  बच्चे, युवा, महिलाएं,  सभी रेत पर बैठे हुए थे । कुछ लोग रेत में घर बना रहे थे तो कुछ उसमे लेट रहे थे । 
"माना जाता है कि भगवान कृष्ण बचपन में इसी रेत पर खेला करते थे । इस रेत पर भगवान् के चरण पड़े हुए हैं इसलिए लोग इस पर बैठकर, खेलकर, लेटकर पवित्र होना चाहते हैं । क्योंकि हवा, पानी, मिट्टी तो आज भी वही है जो हजारों साल पहले थी ।"

रमन रेती कंपाउंड


मन्दिर के सामने

गौशाला के पास


पावन रेत पर सुकून के पल



हाथी से बात करता हुआ अर्नव











रमन रेती आश्रम में मंदिर एवं साधू संतों के निवास हेतु कक्ष बने हुए हैं । वहां एक हाथी भी बंधा हुआ था जिसको देखकर अर्नव की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा । हाथी मेरे साढ़े तीन साल के बेटे अर्नव का, किस्से कहानियों की काल्पनिक दुनिया का पसंदीदा चरित्र है । आज उसने पहली बार सजीव हाथी देखा तो झूम उठा और अपने प्यारे हाथी दादा से बातें करने लगा ।

बाहर निकलकर कुछ दूरी पर एक छोटा अभ्यारण्य है जहाँ हिरन, शुतुरमुर्ग, खरगोश आदि हैं जिनको देखकर अर्नव और मेरी भतीजी सारा को खूब मजा आया ।

श्रीकृष्ण जन्मस्थान

इसके बाद हम पहुंचे मथुरा के मुख्य आकर्षण, विश्व प्रसिद्द श्री कृष्ण जन्मभूमि मन्दिर । यहां कंस का कारागार था, जहाँ श्रीकृष्ण ने भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की आधी रात अवतार ग्रहण किया था। आज यह कटरा केशवदेव नाम से प्रसिद्व है । कालक्रम में यह मन्दिर कई बार पुनर्निर्मित किया गया है क्योंकि बार बार इसे विधर्मियों द्वारा तोडा गया । औरंगजेब के शासनकाल में तो श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर एक मस्जिद का निर्माण भी करवाया गया जो आज भी विद्यमान है और मन्दिर से बिलकुल सटी हुई है । सिर्फ यही संतोष की बात है कि वह गर्भगृह के ठीक ऊपर ना होकर थोडा सा हटके है । जन्मभूमि मन्दिर के दो भाग हैं । पहला गर्भगृह जहां कंस का कारागार था जिसमे भगवान ने अवतार लिया था और दूसरे हिस्से में विशाल, भव्य भागवत भवन है जिसमें प्रमुख रूप से राधा कृष्ण मन्दिर सहित पांच मन्दिर हैं । सम्भतः भागवत भवन की कुर्सी को ऊंचा रखने के लिए यह भवन काफी ऊँचाई पर बनाया गया है ।

प्रवेश द्वार पर दो बार बहुत ही कड़ी और सख्त सुरक्षा जाँच से गुजरना होता है ।  मोबाइल, कैमरा आदि मन्दिर प्रांगण में ले जाने की अनुमति नहीं है । इसकी जानकारी मुझे पहले से थी अतः हमने अपने मोबाइल और कैमरा अपने ड्राईवर के पास ही छोड़ दिए थे । वैसे प्रवेश द्वार के पास ही लगेज और मोबाइल आदि रखने हेतु सशुल्क काउंटर भी बने हुए हैं । मन्दिर के अंदर और बाहर crpf के जवान पूरी मुस्तैदी के साथ तैनात रहते हैं । 
लाइन में लगकर आगे बढ़ते हुए लगभग एक घण्टे में हम मन्दिर के अंदर उस स्थान पर पहुंचे जहां श्रीकृष्ण अवतरित हुए थे । इसकी संरचना कारागार की तरह ही है । वहां से बाहर निकलकर सामने राधा कृष्ण के विशाल मन्दिर जिसे भागवत भवन भी कहते हैं में एक घण्टे समय बिताया । दोनों मन्दिरों और पूरे प्रांगण में असीम मानसिक शांति प्राप्त होती है । बाहर आने का मन ही नहीं कर रहा था । 


चित्र- गूगल से साभार 

मस्जिद की तुलना में मंदिर में अत्यधिक भीड़ रहती है । मस्जिद में जुम्मे या कोई विशेष दिन ही लोग ज्यादा जाते हैं मन्दिर से मस्जिद में नही जाया जा सकता । दोनों में प्रवेश के बाहर से अलग अलग रास्ते हैं । पहले एक में प्रवेश करके दुसरे में जाया जा सकता था पर कहते हैं कि 1991 में अयोध्या के बाबरी मस्जिद और रामजन्मभूमि विवाद के बाद यहाँ कृष्ण जन्मभूमि मन्दिर और ऐतिहासिक मस्जिद के रस्ते अलग अलग कर दिए गए और सीआरपीएफ भी तभी से यहां तैनात है ।
मन्दिर प्रांगण में प्रसाद, फूल तथा अन्य पूजा सामग्री आदि की दुकानों के साथ ही ब्रजवासी की मिठाई दूकान भी है जहां से हमने पेड़े लिए और लस्सी पी । निशुल्क RO का शुद्ध पानी उपलब्ध है । एक कृत्रिम गुफा है जिसके अंदर भगवान् की लीलाओं की सशुल्क झांकी है ।
कैमरा या मोबाइल ना होने के कारण यहां कोई फोटो नहीं ले सके ।

लगभग साढ़े आठ बजे हम अपने होटल पहुंचे । होटल के रेस्टॉरेंट में ही सभी ने अपनी अपनी पसन्द का भोजन किया । दूसरे दिन जल्दी उठकर गोवर्धन, नन्दगाँव और बरसाना के लिए निकलना था इसलिए जल्दी सोना ही उचित समझा । 


इस भाग में इतना ही ।

अगला भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

1 comment:

  1. आपकी रचनात्मकता का मुझे गर्व है। आपने अद्वितीय और मनोहारी बातें प्रस्तुत की हैं। मेरा यह लेख भी पढ़ें मथुरा में घूमने की जगह

    ReplyDelete